कभी स्कूल में बनाते थे पोस्टर, आज दीवारों पर बिखेर रहे रंग, 31 साल से जारी है विहंग का अनोखा सफर

कोटा. कहते हैं एक पेंटर ने अपनी सबसे अच्छी पेंटिंग बनाई और चौराहे पर रख दी. उसे पूरा यकीन था कि इसमें कोई कमी नहीं निकलेगी. शाम को लौटा तो देखा कि लोगों ने उस पर जगह-जगह काले निशान लगा दिए थे. पेंटिंग की सारी सुंदरता चली गई. वह मायूस होकर अपने दोस्त के पास गया. दोस्त ने कहा कि वैसी ही एक और पेंटिंग बनाओ, पर इस बार लोगों से कहो कि जहां कमी दिखे, वहां निशान मत लगाओ, खुद ठीक कर दो. पेंटर ने ऐसा ही किया. शाम को गया तो पेंटिंग जस की तस रखी थी. किसी ने उसे छुआ तक नहीं.
दोस्त ने समझाया कि गलती निकालने वाले हर जगह मिल जाते हैं, पर सुधारने के लिए कोई आगे नहीं आता. ये कहानी कोटा के विज्ञान नगर में रहने वाले विहंग कुमार को सुनाने के लिए काफी है, क्योंकि उनकी जिंदगी भी रंग और ब्रश के इर्द-गिर्द ही घूमती है. वे 31 साल से दीवारें रंग रहे हैं. उनके लिए ये सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं रहा, इसी में उनका मन रमता है. वे कहते हैं कि घंटों काम करके शरीर थक जाता है, पर जो काम पसंद का हो, उससे मन नहीं थकता.
स्कूल के पोस्टर से शुरू हुआ था सफर
विहंग ने 14 मई 1995 को पेंटिंग का काम शुरू किया था. चित्र बनाने का शौक बचपन से था. स्कूल में पोस्टर और पेंटिंग की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते थे. एक बार विश्व जनसंख्या दिवस पर लंदन में लगने वाली प्रदर्शनी के लिए पोस्टर बनाया, जो कोटा से लेकर मुंबई स्तर तक चुना गया. वे बताते हैं कि इसी के बाद लगा कि इस राह पर आगे बढ़ना चाहिए. आजकल फ्लेक्स और डिजिटल प्रिंटिंग से मिनटों में डिजाइन तैयार हो जाता है. फिर भी विहंग मानते हैं कि हाथ से बनी पेंटिंग की बात ही अलग है. उसमें कलाकार की मेहनत और बारीकी साफ दिखती है. ऐसा नहीं कि वे नई तकनीक से दूर हैं. नए डिजाइन और आकृतियों के आइडिया के लिए वे एआई की मदद भी लेते हैं, लेकिन दीवार पर उतारते अपने अनुभव और अपनी सूझ से ही हैं.
विहंग कई राज्यों में कर चुके हैं काम
विहंग होटल, रेस्टोरेंट, मंदिर और स्कूलों में वे पेंटिंग कर चुके हैं. कार्टून, पोर्ट्रेट, डिजाइन और लिखावट में भी उनका हाथ अच्छा चलता है. गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली समेत कई राज्यों में उन्होंने काम किया है. इन दिनों वे कोटा नगर निगम के दिवाली सौंदर्यीकरण अभियान में शहर की दीवारों पर चित्र बना रहे हैं. एक पेंटिंग का विषय ‘उत्सव’ है, जिसमें एक परिवार दिवाली की खरीदारी करता दिखता है. उनकी कोशिश है कि दीवारों पर त्योहार की रौनक और हमारी संस्कृति की झलक दिखे.
पेंटर के लिए तारीफ ही असली इनाम है
विहंग के लिए सबसे बड़ा इनाम किसी सम्मान से ज्यादा लोगों के चेहरे की मुस्कान है. लोग जब उनकी पेंटिंग देखकर तारीफ करते हैं, तो उन्हें लगता है कि मेहनत वसूल हो गई. उनकी मां को भी स्कूल के दिनों में पेंटिंग का शौक था, तो घर में कला का माहौल पहले से था. पेंटिंग से अपने रिश्ते के बारे में वे कहते हैं, “पेंटिंग ही मेरी लाइफ है. मेरे लिए ये काम नहीं, ध्यान साधना है.” उस पेंटर की सीख यहां भी लागू होती है. कमी निकालना आसान है, पर उसे सुधारने के लिए हुनर, मेहनत और जिम्मेदारी चाहिए. शायद इसी वजह से विहंग कुमार 31 साल से बिना रुके अपने रंगों से शहर में अपनी पहचान बना रहे हैं.



