खेजड़ी के लिए 363 लोगों ने दिया था बलिदान, सोने-चांदी के गहनों से सजी महिलाएं पहुंचीं शहीदी मेले में

Last Updated:September 21, 2026, 22:28 IST
Jodhpur Hindi News: जोधपुर के खेजड़ली गांव में शहीदी मेले का आयोजन हुआ, जहां महिलाएं एक करोड़ रुपए से ज्यादा की ज्वेलरी पहनकर 363 शहीदों को नमन करने पहुंचीं. यह मेला 296 साल पहले खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए दिए गए बलिदान की याद में हर साल भरता है.
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जोधपुर: पेड़ों की रक्षा के लिए अपनी जान गवाने वाली अमृता देवी और विश्नोई समाज के वे 363 लोग जिन्होंने बलिदान दिया, उन्हीं की याद में हर साल राजस्थान में विश्नोई समाज का विशेष मेला आयोजित होता है. जोधपुर के खेजड़ली गांव में सोमवार को शहीदी मेले का आयोजन हुआ. खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए 296 साल पहले 363 लोगों के दिए बलिदान को याद करने के लिए हर साल यह मेला भरता है. इस बार मेले में बिश्नोई समाज की महिलाओं का अलग ही रूप देखने को मिला. महिलाएं सोने के भारी-भरकम आभूषण पहनकर मेले में पहुंची. किसी ने गले में कई तोले की हार पहन रखी थी तो किसी के हाथों में सोने के कंगन और कानों में भारी झुमके नजर आए.
कई महिलाएं लाखों रुपए की ज्वेलरी पहनकर पहुंचीं, जबकि कुछ महिलाओं के आभूषणों की कीमत करीब एक करोड़ रुपए तक बताई गई. गृहिणियों के साथ बिजनेस से जुड़ी महिलाएं भी मेले में पहुंचीं और शहीदों को नमन कर खेजड़ी और पर्यावरण बचाने का संदेश दिया.
दूर-दूर से पहुंचे लोग, हवन में दी नारियल की आहुतिखेजड़ली मेले में सिर्फ जोधपुर ही नहीं, बल्कि राजस्थान के कई जिलों से लोग पहुंचे. फलोदी, नागौर, बीकानेर, सांचौर, जालोर और पाली सहित कई जगहों से बिश्नोई समाज के लोग यहां आए. राजस्थान के बाहर से भी लोग मेले में शामिल हुए. हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश से आए लोगों ने भी खेजड़ली पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी. मेले में हवन का आयोजन हुआ, जहां लोगों ने नारियल की आहुति दी. इसके बाद शहीद स्मारक पर पहुंचकर 363 शहीदों को नमन किया गया. सुबह से ही खेजड़ली में लोगों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा.
पेड़ बचाने के लिए अमृता देवी के साथ खड़े हो गए थे ग्रामीणखेजड़ली में आज से 296 साल पहले पेड़ों को बचाने के लिए ऐसा आंदोलन हुआ था, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है. बताया जाता है कि महाराजा अभय सिंह के समय महल निर्माण के लिए खेजड़ी के पेड़ काटने के लिए सैनिक खेजड़ली पहुंचे थे. सैनिकों ने पेड़ काटना शुरू किया तो गांव की अमृता देवी ने इसका विरोध किया. वह पेड़ से लिपट गईं. इसके बाद उनकी बेटियां आसू, रत्नी और भागू बाई भी पेड़ों से चिपक गईं. एक के बाद एक गांव के लोग भी पेड़ों को बचाने के लिए सामने आ गए. सैनिकों की कार्रवाई में 363 लोगों की जान चली गई। इनमें 71 महिलाएं और 292 पुरुष शामिल थे.
363 लोगों की शहादत की याद में हर साल लगता है मेलाखेजड़ली की घटना के बाद महाराजा अभय सिंह को जब 363 लोगों के बलिदान की जानकारी मिली तो पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने का आदेश दिया गया. बिश्नोई समाज को लिखित रूप से भरोसा दिया गया कि मारवाड़ में खेजड़ी के पेड़ों को नहीं काटा जाएगा. इसी घटना की याद में हर साल भादवा की दशमी को खेजड़ली में शहीदी मेला लगता है. इस मेले में देश के अलग-अलग हिस्सों से बिश्नोई समाज के लोग पहुंचते हैं. पेड़ों के साथ वन्यजीवों की रक्षा को लेकर भी समाज लंबे समय से काम करता रहा है. खेजड़ली की शहादत को आज भी पर्यावरण बचाने की मिसाल के तौर पर याद किया जाता है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Jodhpur,Rajasthan
First Published :
September 21, 2026, 22:28 IST



