खेतलाजी मंदिर की अनोखी परंपरा, शेषनाग रूप में होती है खास आरती, जानें सोनाणा मंदिर का रहस्य और मान्यता

पाली. राजस्थान के मारवाड़ में आस्था और चमत्कारों के कई धाम हैं, लेकिन पाली जिले का श्री सोनाणा खेतलाजी मंदिर अपने आप में बेहद खास और अनूठा है. अरावली की वादियों के बीच बसा यह पावन धाम केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए ही नहीं, बल्कि यहां की अनोखी परंपराओं और अद्भुत आरती के लिए भी देशभर में प्रसिद्ध है. सोनाणा खेतलाजी मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है यहां का प्राकृतिक सौंदर्य और वास्तुकला. पहाड़ पर बना यह मंदिर दूर से देखने पर बिल्कुल एक सांप के स्वरूप जैसा नजर आता है, जिसकी विशाल आंखें हर किसी को आश्चर्यचकित कर देती हैं.
पहाड़ पर बना यह धाम दूर से देखने पर बिल्कुल एक विशाल सांप के स्वरूप में नजर आता है, जिसकी उकेरी गई आंखें हर किसी को हैरत में डाल देती हैं.मंदिर परिसर में स्थापित भगवान काला भैरव की दो विशाल मूर्तियां, जो अपने सवारी रूप दो वफादार श्वानों (डॉग्स) के साथ विराजमान हैं, श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं. इसके साथ ही इस पावन धाम में भक्तों को प्रभु श्री हनुमान जी और शनिदेव महाराज के दिव्य दर्शन भी एक ही प्रांगण में प्राप्त होते हैं.
शेषनाग के रूप में होती है आरतीइस मंदिर का सबसे अद्भुत और अलौकिक दृश्य तब बनता है जब आरती का समय होता है. यहां मुख्य पुजारी द्वारा शेषनाग के रूप में की जाने वाली विशेष आरती इतनी दिव्य होती है कि दर्शन के लिए आए भक्त भाव-विभोर हो उठते हैं. आस्था की बात करें तो आज भी मारवाड़ का यह धाम मन्नतों का केंद्र है. लोग अपने छोटे बच्चों के पहले बाल (मुंडन संस्कार) कराने और मनोकामना पूरी होने पर परंपरा अनुसार ‘बावड़ी चढ़ाने’ के लिए दूर-दूर से नंगे पांव खिंचे चले आते हैं.
800 साल पुराना ऐतिहासिक इतिहास और मान्यतासारंगवास में स्थित श्री खेतलाजी का इतिहास लगभग 800 वर्ष पुराना माना जाता है. खेतलाजी बावसी को भगवान शिव के पांचवें अवतार भगवान भैरव (क्षेत्रपाल) के रूप में पूजा जाता है. लोक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में भगवान भैरव अरावली पर्वत श्रृंखला की गुफाओं में तपस्या करने वाले ऋषियों-मुनियों की रक्षा करते थे. कालंतर में यही गुफा स्थान जन-जन की आस्था का स्थायी केंद्र बन गया.
अद्भुत परंपराएं और विशेषताएंनाग स्वरूप संरचना और शेषनाग आरती: पहाड़ को तराशकर सांप की आकृति और आंखों का रूप दिया गया है. संध्या और प्रात:काल के समय पंडित जी जब शेषनाग स्वरूप धारण कर विशेष मुद्रा में महाआरती करते हैं, तो उस पल को निहारने के लिए सैकड़ों श्रद्धालुओं का जमावड़ा लग जाता है.
काला-गोरा भैरव व श्वान सवारी: क्षेत्रपाल जी के पहरेदार के रूप में काला भैरव की विशाल प्रतिमाएं श्वानों के साथ विराजमान हैं.
मुंडन और बावड़ी चढ़ाने की परंपरा: नवजात शिशुओं के सुखी जीवन और दीर्घायु के लिए यहां मुंडन (झड़ूला) चढ़ाने का विशेष महत्व है. साथ ही परिवार में विवाह या मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु ‘बावड़ी चढ़ाने’ (विशिष्ट पोशाक/आंगी अर्पित करने) की सदियों पुरानी परंपरा निभाते हैं.
प्रसाद का अनोखा नियम: इस मंदिर की एक सबसे बड़ी धार्मिक खासियत यह भी है कि यहां का चूरमा-प्रसाद मंदिर परिसर के बाहर ले जाना वर्जित है. श्रद्धालु इसे धाम के भीतर ही ग्रहण करते हैं.



