Rajasthan

जिस कलाकार ने जयपुर की ब्लू पॉटरी को दिलाई दुनियाभर में पहचान, आज उनकी बेटियां उसी विरासत को दे रही हैं नई उड़ान

Last Updated:October 01, 2026, 13:49 IST

Kripal Singh Shekhawat Blue Pottery: कृपाल सिंह शेखावत ने जयपुर की पारंपरिक ब्लू पॉटरी को देश-विदेश में पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई. उनकी कला और योगदान ने इस शिल्प को नई पहचान और सम्मान दिलाया. आज उनकी बेटियां भी परिवार की इस कलात्मक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं. वे ब्लू पॉटरी की पारंपरिक कला को सहेजने के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाने और इसे व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में काम कर रही हैं.

ख़बरें फटाफट

जयपुर: जयपुर कला संस्कृति और विरासत से जुड़ा शहर हैं जहां पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों ने हस्तकला की विरासत को आगे बढ़ाया हैं. ऐसी हस्तकला और शिल्पकला के लिए मशहूर जयपुर की ब्लू पॉटरी जिसे दुनियाभर लोग खूब पसंद करते हैं. आज भी अन्य धातुओं के बर्तन और सजावटी वस्तुओं में जयपुर की ब्लू पॉटरी की खूब डिमांड रहती हैं. जयपुर में ब्लू पॉटरी के इन नीले रंग के मिट्टी के बर्तनों की कला 16वीं-17वीं शताब्दी में मुगल शासनकाल के दौरान फारस से भारत में आई थी और इसी के साथ जयपुर ब्लू पॉटरी का सफर शुरू हुआ, जिसके जनक श्री कृपाल सिंह शेखावत को माना जाता हैं. आज भी उनके परिवार के लोग इस कला को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं.

लोकल-18 ने कृपाल सिंह शेखावत की बेटी मीनाक्षी राठौड़ से ब्लू पॉटरी कला के सफर को लेकर बात की तो वह बताती हैं कि 1868 में, जयपुर के महाराजा सवाई राम सिंह ने जयपुर में एक शिल्प विद्यालय की स्थापना की. 1963 में, कोलकाता के शांति निकेतन और जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय से प्रशिक्षित कलाकार श्री कृपाल सिंह शेखावत को जयपुर के सवाई राम सिंह शिल्प कला मंदिर का निदेशक नियुक्त किया गया था, तब तक कभी प्रसिद्ध रही जयपुर की नीली मिट्टी के बर्तनों की कला लुप्त हो चुकी थी. लेकिन उनके पिता ने नए रंगों, डिज़ाइनों, भट्टी आदि के साथ सब कुछ नए सिरे से शुरू किया.

1960 में कृपाल सिंह शेखावत ने “कृपाल कुंभ” की शुरुआतलोकल-18 से बात करते हुए मीनाक्षी राठौड़ बताती हैं कि लुप्त होती ब्लू पॉटरी की कला को निखारने की लिए उनके पिता का सबसे बड़ा योगदान रहा हैं. 1960 के दशक के उत्तरार्ध में श्री कृपाल सिंह शेखावत ने “कृपाल कुंभ” की शुरुआत की जिसके तहत ब्लू पॉटरी को लेकर खास प्रयोग किए गए जिनमें सबसे खास यह हैं कि पहले ब्लू पॉटरी में सिर्फ नीले रंग का उपयोग किया जाता था. फिर उनके पिता ने हरे, पीले, भूरे और काले आदि रंगों के विभिन्न शेड्स तैयार कर ब्लू पॉटरी को रंगों का नया आयाम दिया और ब्लू पॉटरी में पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों के डिज़ाइनों के साथ-साथ नए डिज़ाइन और आकार भी दिखने लगे. लोकल-18 से बात करते हुए मीनाक्षी बताते हैं कि कृपाल सिंह ने झुंझुन जिले के श्रीमाधोपुर के एक छोटे से गांव से निकल कर भारत के एक प्रसिद्ध हस्तशिल्प कलाकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई, जिन्हें 1974 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया और वर्ष 2002 में उन्हें भारत सरकार की ओर से शिल्प गुरू की उपाधि से भी सम्मानित किया गया.

कैसे तैयार होते हैं ब्लू पॉटरी के बर्तनलोकल-18 से बात करते हुए मीनाक्षी राठौड़ बताती हैं कि कोबाल्ट से उत्पन्न नीला रंग फारस में पाया जाता है. फारसी भाषा में कोबाल्ट को ज़फ़र कहा जाता है. कोबाल्ट युक्त रेत को गिल-ए-लज्वर्थ (लज्वर्थ, लैपिस लाजुली) कहते हैं. इसके मुख्य घटक क्वार्ट्ज और कांच हैं. इन दोनों और थोड़ी मात्रा में मुल्तानी मिट्टी को मिलाकर एक मिश्रण बनाया जाता है. बर्तनों को सैंडपेपर से चिकना किया जाता है. फिर उन पर स्लिप-कवर लगाया जाता है, उसके बाद डिज़ाइन बनाया जाता है और रंग भरा जाता है. रंग धात्विक ऑक्साइड होते हैं. गहरा नीला रंग कोबाल्ट से और हल्का नीला रंग तांबे से बनता है. फिर उस पर ग्लेजिंग की जाती है और उसे पकाया जाता है. जिसके बाद ब्लू पॉटरी के बर्तन तैयार होते हैं. मीनाक्षी बताती हैं कि उनकी बहन मुकुंद राठौड़ के साथ मिलकर आज भी वह जयपुर की ब्लू पॉटरी को दुनियाभर में पहुंचा रही हैं. जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से भ सम्मानित किया जा चुका हैं.

About the AuthorJagriti Dubey

मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…

और पढ़ेंLocation :

Jaipur,Rajasthan

First Published :

October 01, 2026, 13:49 IST

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj