डीडवाना में कच्ची दीपावली पर दुकानों की मालकिन बनती हैं घर की लक्ष्मी, गोबर से ‘मंडे’ जाते हैं आंगन

Last Updated:November 08, 2026, 08:37 IST
Didwana Unique Tradition On Diwali: डीडवाना में कच्ची दीपावली (रूप चतुर्दशी) पर ‘मंडा-मांडने’ की सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है. इस दिन महिलाएं घरों से निकलकर व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर पहुंचती हैं, आंगनों को गोबर से लीपकर गेरू व मुलड से मांडने बनाती हैं और दुकानों की कमान संभालती हैं. व्यापारी शंकर परसावत, शशिकला व प्रमिला गोयल के अनुसार यह अनूठी परंपरा व्यापार में वृद्धि व समृद्धि का प्रतीक है.
Didwana News: कच्ची दीपावली पर डीडवाना में अनूठी परंपरा, दुकानों की मालकिन बनती हैं महिलाएं
डीडवाना. आधुनिक तकनीक, फ्लेक्स-बैनर और डिजिटल विज्ञापनों के इस दौर में भी डीडवाना शहर ने अपनी सदियों पुरानी संस्कृति और लोक परंपराओं की खुशबू को पूरी शिद्दत के साथ संजोए रखा है. पूरे भारतवर्ष में शायद ही कहीं ऐसा अनूठा नजारा देखने को मिले, जहां दीपावली से एक दिन पहले यानी ‘कच्ची दीपावली’ (रूप चतुर्दशी) के मौके पर घर की लक्ष्मी (महिलाएं) अपने घरों से निकलकर अपने परिवार के व्यापारिक प्रतिष्ठानों की कमान संभालती हैं. यह अनूठी ‘मंडा-मांडने’ की परंपरा सिर्फ डीडवाना या डीडवानावासियों द्वारा बसाई गई बस्तियों में ही नजर आती है.
लोक मान्यताओं के अनुसार, घर की लक्ष्मी साल में सिर्फ एक दिन यानी कच्ची दीपावली के दिन ही बाहर निकलती हैं. इस दिन महिलाएं अपने घरों को सजाने के बाद अपने पारिवारिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों (दुकानों और व्यावसायिक परिसरों) पर पहुंचती हैं. दुकानों के आंगनों को पहले पवित्र गोबर से लीपा जाता है, और उसके बाद पारंपरिक विधि-विधान से गेरू और मुलड से (मांडने) बनाए जाते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से व्यापार में बरकत होती है, घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है और कारोबार दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करता है. इस दिन प्रतिष्ठान की पूर्ण मालकिन महिलाएं ही मानी जाती हैं और उस पूरे समय कामकाज की कमान भी उन्हीं के हाथों में रहती है.
सालभर रहता है इस विशेष दिन का इंतजारसाल के 364 दिन अमूमन घरों की चारदीवारी और पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने वाली महिलाओं के लिए कच्ची दीपावली का यह दिन एक बड़े पर्व से कम नहीं होता. महिलाएं इस दिन का पूरा एक साल इंतजार करती हैं. कच्ची दीपावली की शाम जब महिलाएं बाजारों में निकलती हैं, तो बाजारों की भव्य रोशनी, आतिशबाजी और सजे-धजे व्यापारिक प्रतिष्ठान देखते ही बनते हैं. इस दौरान प्रतिष्ठानों पर महिलाओं का पारंपरिक स्वागत किया जाता है और उन्हें उपहार भी भेंट किए जाते हैं. व्यापारी शंकर परसावत, शशिकला और प्रमिला गोयल का कहना है कि आधुनिकता की दौड़ के बीच डीडवाना की महिलाओं और समाज ने अपनी इस सांस्कृतिक थाती को जिस प्रकार जीवित रखा है, वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Didwana,Nagaur,Rajasthan
First Published :
November 08, 2026, 08:02 IST



