Rajasthan

पटियाला घराने के दिग्गज उस्ताद बड़े गुलाम अली खान; जानिए क्यों ऐतिहासिक है हैदराबाद में बना उनका मजार?

Last Updated:October 28, 2026, 21:51 IST

Hyderabad Ustad Bade Ghulam Ali Patiala Gharana History: पटियाला घराने के महान शास्त्रीय गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान का हैदराबाद से गहरा रिश्ता रहा. उन्होंने अपने जीवन के आखिरी दिन हैदराबाद के बशीरबाग पैलेस में बिताए, उनकी गाई ठुमरियां ‘याद पिया की आए’ और ‘आए ना बालम का करूं सजनी’ मील का पत्थर बनीं. फिल्मों से दूर रहने वाले उस्ताद जी से जब निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ (1960) के लिए संपर्क किया, तो उन्होंने टालने के लिए उस दौर की सबसे बड़ी रकम 25,000 रुपये प्रति गीत मांगी.

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हैदराबाद. 20वीं सदी के सबसे महान शास्त्रीय गायकों में शुमार उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान का हैदराबाद से बेहद गहरा और आत्मीय रिश्ता रहा. पटियाला घराने की गायकी को दुनिया भर में अलग पहचान दिलाने वाले उस्ताद जी ने अपनी जिंदगी के आखिरी दिन इसी ऐतिहासिक शहर में बिताए. 23 अप्रैल 1968 को हैदराबाद के बशीरबाग पैलेस में उनके इंतकाल के बाद उन्हें पुरानी हवेली के पास सुपुर्द-ए-खाक किया गया था.

इतिहास के जानकार मोइन खान बताते हैं कि 2 अप्रैल 1902 को अविभाजित पंजाब के कसूर में जन्मे बड़े गुलाम अली ख़ान को संगीत विरासत में मिला. पिता उस्ताद अली बख्श ख़ान और चाचा काले ख़ान से तालीम पाकर उन्होंने गायकी और सारंगी, दोनों में महारत हासिल की. 1947 में विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए, लेकिन भारतीय संगीत की पुकार उन्हें वापस ले आई. 1957 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री मोरारजी देसाई के विशेष प्रयासों से उन्हें भारत की स्थायी नागरिकता मिली.

ठुमरी गायकी को दी नई ऊंचाईशाहिद उमेरे बताते हैं कि उस्ताद जी की आवाज तीन सप्तकों में सहजता से गूंजती थी. ठुमरी गायकी में पंजाब अंग की मिठास और द्रुत तानों को जोड़कर उन्होंने इसे नई ऊंचाई दी. उनकी गाई ठुमरियां ‘याद पिया की आए’ और ‘आए ना बालम का करूं सजनी’ मील का पत्थर बनीं. फिल्मों से दूर रहने वाले उस्ताद जी से जब निर्देशक के. आसिफ ने फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ (1960) के लिए संपर्क किया, तो उन्होंने टालने के लिए उस दौर की सबसे बड़ी रकम 25,000 रुपये प्रति गीत मांगी. आसिफ तुरंत मान गए और उन्होंने ‘प्रेम जोगन बन के’ व ‘शुभ दिन आयो राज दुलारा’ जैसी दो अमर रचनाएं दीं.

बशीरबाग पैलेस में बिताए जिंदगी के आखिरी दिन
उम्र के आखिरी पड़ाव में लकवे से पीड़ित होने के बाद वे स्वास्थ्य लाभ के लिए हैदराबाद पहुंचे. राज्य सरकार और संगीत प्रेमियों ने उनके रहने की व्यवस्था ऐतिहासिक बशीरबाग पैलेस में की. बीमारी के बावजूद वे यहां रियाज करते और शागिर्दों को सिखाते रहे. 23 अप्रैल 1968 को 66 वर्ष की उम्र में उन्होंने बशीरबाग पैलेस में अंतिम सांस ली. उन्हें पुरानी हवेली क्षेत्र के पास स्थित ऐतिहासिक दाराब जंग के दायरे में दफनाया गया. आज भी शास्त्रीय संगीत के चाहने वाले इस मजार पर पहुंचकर सुरों के इस महान साधक को खिराज-ए-अकीदत पेश करते हैं.
About the Authorआनंद पाण्डेयContent Producer

आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अ…

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Hyderabad,Hyderabad,Telangana

First Published :

October 28, 2026, 21:51 IST

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