प्लास्टिक की कुर्सियों के दौर में भी बरकरार है अजमेर के मूढ़ों का क्रेज, ऋषि घाटी पर 5-6 पीढ़ियों से बन रहे हैं मूढ़े

Last Updated:October 30, 2026, 08:13 IST
Traditional Mudha Craft of Ajmer: धार्मिक नगरी अजमेर में प्लास्टिक की कुर्सियों और आधुनिक फर्नीचर के बढ़ते चलन के बावजूद पारंपरिक मूढ़ों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है. अजमेर की ऋषि घाटी बस्ती में रहने वाले कई परिवार 5-6 पीढ़ियों से इस पुश्तैनी कला को आगे बढ़ा रहे हैं. अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे इस काम से आज लगभग 3000 लोगों की आबादी जुड़ी हुई है. आरामदायक बैठने के अनुभव के कारण इन मूढ़ों की मांग केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन माध्यमों के जरिए देश-विदेश में भी लगातार बनी हुई है.
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Ajmer: धार्मिक नगरी अजमेर में मूढ़े बनाने का काम कई पीढ़ियों से लगातार जारी है. बदलते समय के साथ भले ही बाजार में प्लास्टिक की कुर्सियों और आधुनिक टेबलों का चलन काफी तेजी से बढ़ा है, फिर भी पारंपरिक मूढ़ों की अपनी एक अलग पहचान और मांग बनी हुई है. आज भी बड़ी संख्या में लोग आरामदायक बैठने और अपने घरों को पारंपरिक लुक देने के लिए मूढ़े खरीदना पसंद करते हैं. अजमेर की ऋषि घाटी पर बसी बस्ती में रहने वाले दर्जनों परिवार इस पारंपरिक हस्तशिल्प काम से गहराई से जुड़े हुए हैं और अपनी इस पुश्तैनी कला को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं.
ऋषि घाटी में मूढ़े बनाने का काम करने वाले स्थानीय कारीगर तुलसीराम बताते हैं कि यह काम कोई नया नहीं है, बल्कि अंग्रेजों के जमाने से ही इस क्षेत्र में किया जा रहा है. वह खुद भी पिछले 40 वर्षों से इस कला में रमे हुए हैं और उनसे पहले उनके पिता, दादा और परदादा भी यही काम करते थे. उनके परिवार की पांच से छह पीढ़ियां मूढ़े बनाने का काम करती आ रही हैं. तुलसीराम का कहना है कि यह केवल उनके लिए रोजगार का जरिया नहीं है, बल्कि उनके परिवार की एक बेहद पुरानी विरासत और परंपरा भी है. उनकी बस्ती में करीब 3000 लोग निवास करते हैं और उनमें से अधिकांश लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मूढ़े बनाने के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं.
देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है मांग: ऑनलाइन बाजार से मिला बढ़ावातुलसीराम आगे बताते हैं कि अजमेर में तैयार होने वाले इन खूबसूरत मूढ़ों की मांग केवल शहर या राज्य तक ही सीमित नहीं है. इनकी मजबूती और सुंदरता के कारण देश के अलग-अलग राज्यों के साथ-साथ विदेशों में भी लोग इन्हें बहुत पसंद करते हैं. आज के डिजिटल और ऑनलाइन खरीदारी के दौर में लोग ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से भी सीधे मूढ़ों का ऑर्डर देते हैं. ऑनलाइन माध्यमों से जुड़ने के कारण स्थानीय कारीगरों को अपने हस्तनिर्मित उत्पादों को देश-दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाने का बेहतरीन अवसर मिल रहा है.
आधुनिक कुर्सियों के बीच भी कायम है मूढ़ों की महत्ताबाजार में प्लास्टिक और लोहे के सस्ते फर्नीचर के आने से मूढ़ों के पारंपरिक कारोबार पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है, लेकिन इनकी मूल मांग पूरी तरह कभी खत्म नहीं हुई. लोग आज भी प्लास्टिक की कुर्सियों की तुलना में मूढ़ों को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि प्राकृतिक सरकंडों और रस्सियों से बने इन मूढ़ों पर बैठना सेहत और शारीरिक आराम के लिहाज से बहुत बेहतर माना जाता है. यही वजह है कि ऋषि घाटी के कारीगर चुनौतियों के बावजूद अपनी इस ऐतिहासिक कला को जिंदा रखे हुए हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Ajmer,Ajmer,Rajasthan
First Published :
October 30, 2026, 08:13 IST



