माता ने सपने में दिया संकेत, तालाब की खुदाई में मिली प्रतिमा, ऐसे बना चामुंडा माता मंदिर

Last Updated:October 11, 2026, 09:52 IST
Chamunda Mata Temple Ahor Jalore History: राजस्थान के जालौर जिले के आहोर में स्थित चामुंडा माता का मंदिर अपनी 400 साल पुरानी आस्था और चमत्कारिक कथा के लिए प्रसिद्ध है. कहा जाता है कि सुंधा माता के अनन्य भक्त ठाकुर अनार सिंह को माता ने स्वप्न में दर्शन दिए थे. इसके बाद गांव के तालाब की खुदाई में माता की मूर्ति प्रकट हुई. माता के आदेशानुसार मूर्ति को बैलगाड़ी में रखा गया और जहां बैलगाड़ी रुकी, वहीं यह भव्य मंदिर स्थापित किया गया. इस मंदिर में माता के पूरे स्वरूप की नहीं, बल्कि केवल उनके धड़ की विशेष पूजा की जाती है.
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जालौर: राजस्थान के जालौर जिले में स्थित आहोर कस्बा अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं के लिए पूरे प्रदेश में जाना जाता है. यहां स्थित मां चामुंडा का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है. इस प्राचीन मंदिर का इतिहास लगभग 400 साल पुराना बताया जाता है. इस मंदिर से जुड़ी चमत्कारिक कथा और माता की स्थापना की कहानी इसे अन्य मंदिरों से काफी अलग और खास बनाती है.
इस मंदिर की स्थापना पूर्व ठाकुर घराने के ठाकुर अनार सिंह के समय में हुई थी. बताया जाता है कि आज से करीब 13 पीढ़ी पहले ठाकुर अनार सिंह मां सुंधा माता के बहुत बड़े भक्त हुआ करते थे. उनकी दिनचर्या में सूर्योदय से पहले सुंधा माता के दर्शन करना अनिवार्य रूप से शामिल था. स्थानीय निवासी अर्जुन सिंह बताते हैं कि ठाकुर अनार सिंह का यह कड़ा नियम था कि वे रोज सुबह अपने गांव में स्थित एक बावड़ी की देखरेख करवाने के बाद कच्चे और दुर्गम रास्ते से सुंधा पर्वत तक जाते थे. सुंधा माता के दर्शन किए बिना वे अपने दिन की शुरुआत नहीं करते थे. यह उनकी माता के प्रति अटूट भक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण था.
घोड़ी का निधन और माता का स्वप्न में आनाभक्ति का यह सिलसिला सालों तक बिना किसी रुकावट के चलता रहा. लेकिन एक दिन ठाकुर अनार सिंह की प्रिय घोड़ी का अचानक निधन हो गया. इस दुखद घटना से ठाकुर साहब बेहद दुखी और निराश हो गए. उन्हें घोड़ी के जाने का दुख तो था ही, लेकिन उनके मन में सबसे बड़ी चिंता यह सता रही थी कि अब वे रोज सुबह सुंधा माता के दर्शन के लिए इतनी दूर सुंधा पर्वत कैसे जा पाएंगे. इसी उधेड़बुन और गहरी चिंता में जब वे रात को सोए, तो माता ने उनके स्वप्न में आकर साक्षात दर्शन दिए. माता ने स्वप्न में ठाकुर अनार सिंह से कहा कि उन्हें अब सुंधा पर्वत आने की कोई आवश्यकता नहीं है. माता स्वयं उनके गांव में ही प्रकट होंगी, जिससे वे रोज अपने ही गांव में दर्शन कर सकेंगे.
तालाब की खुदाई और आकाशवाणी का चमत्कारमाता के स्वप्न के बाद ठाकुर अनार सिंह ने सुबह उठकर तुरंत आदेश दिया कि गांव में स्थित तालाब की खुदाई करवाई जाए. आदेश मिलते ही खुदाई का काम शुरू कर दिया गया. इसी दौरान वहां मौजूद एक कुम्हार को खुदाई करते समय अचानक एक रहस्यमयी आकाशवाणी सुनाई दी. वह अजीबोगरीब आवाज सुनकर कुम्हार बुरी तरह डर गया और उसने तुरंत भागकर ठाकुर साहब को इस घटना की पूरी जानकारी दी. खबर मिलते ही ठाकुर अनार सिंह मौके पर पहुंचे और उस खुदाई वाली जगह का गहराई से जायजा लिया. इसके बाद जब सावधानी से थोड़ी और खुदाई की गई, तो वहां से मिट्टी के भीतर से मां चामुंडा की एक अत्यंत सुंदर और अलौकिक प्रतिमा निकली. तभी एक बार फिर आकाशवाणी हुई और माता की ओर से स्पष्ट संदेश मिला कि किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है, वे स्वयं अपने वचन के अनुसार वहां प्रकट हुई हैं.
बैलगाड़ी रुकी और हो गई मंदिर की स्थापनाप्रतिमा मिलने के बाद माता को ससम्मान स्थापित करने की योजना बनाई गई. माता की प्रतिमा को एक बैलगाड़ी में विराजमान कर उस स्थान से ले जाने की तैयारी हुई. स्थानीय मान्यता है कि माता ने पहले ही यह संकेत दे दिया था कि बैलगाड़ी जहां जाकर अपने आप रुक जाएगी, उसी पवित्र स्थान पर उनकी स्थापना की जानी चाहिए. बैलगाड़ी को लेकर जब गांव से यात्रा शुरू हुई, तो कुछ दूरी तय करने के बाद बैलगाड़ी अपने आप एक विशेष स्थान पर रुक गई. लाख कोशिशों के बाद भी जब बैल आगे नहीं बढ़े, तो उसी स्थान को माता की स्थापना के लिए अंतिम रूप से चुन लिया गया. वहीं पर मंदिर का भव्य निर्माण करवाया गया, जो आज आहोर का प्रसिद्ध चामुंडा माता मंदिर कहलाता है.
धड़ की पूजा और नवरात्रि का विशेष महत्वतब से लेकर आज तक मां चामुंडा का यह प्राचीन मंदिर आहोर और आसपास के क्षेत्रों में अपार श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. इस मंदिर की सबसे अनोखी और खास मान्यता यह है कि यहां माता के पूरे स्वरूप के बजाय केवल उनके धड़ की ही पूजा-अर्चना की जाती है. शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान इस मंदिर का अद्भुत नजारा देखने लायक होता है. नवरात्रि में यहां विशेष पूजा, अनुष्ठान और धार्मिक आयोजन बड़ी धूमधाम से किए जाते हैं. मंदिर प्रांगण में विशाल गरबा महोत्सव भी आयोजित होता है, जिसमें सैकड़ों की संख्या में स्थानीय श्रद्धालु और दूर-दराज से आए लोग पूरे उत्साह के साथ शामिल होते हैं. करीब चार सौ साल पुरानी यह अटूट मान्यता आज भी आहोर की मजबूत धार्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Jalor,Jalor,Rajasthan
First Published :
October 11, 2026, 09:52 IST



