मेयर बनाने के लिए कांग्रेस ने क्या-क्या नहीं किया? कई पापड़ बेले पर वोटिंग में टूटकर बिखर गए

जयपुर. राजस्थान निकाय प्रमुखों के चुनाव में बीजेपी से मात खा चुकी कांग्रेस अब इसके कारणों पर मंथन करने में जुटी है. निकाय चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के वोट शेयर में महज एक फीसदी से भी कम का अंतर रहा था. पाली और अजमेर नगर निगमों समेत दर्जनों निकायों में कांग्रेस बीजेपी के मुकाबले संख्या बल में बढ़त में थी. बावजूद उसके वह इन निकायों में अपना बोर्ड नहीं बना सकी. निर्दलीयों को साधने में बीजेपी से पिछड़ी कांग्रेस ने अपने पार्षदों के साथ कई निर्दलीयों को बाड़ाबंदी में रखा लेकिन वे उसके नहीं हुए.
कांग्रेस को सबसे ज्यादा मात पाली और अजमेर नगर निगम में खानी पड़ी. वहां उसकी बोर्ड बनाने की तैयारियां धरी की धरी रह गई. पाली में तो उसके अपने ही दगा दे गए. 29 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी कांग्रेस को मेयर के लिए महज तीन वोट ही मिले. निर्दलीय छोड़ उसके खुद के 26 पार्षद क्रॉस वोटिंग कर गए. कांग्रेस ने पार्षदों की बाड़ाबंदी में सबसे ज्यादा मशक्कत अजमेर नगर निगम के लिए की थी. लेकिन वहां भी बीजेपी उसकी बाड़ाबंदी में सेंध लगा गई. अजमेर नगर निगम में अपना बोर्ड बनाने के लिए कांग्रेस को कई पापड़ बेलने पड़े लेकिन जब वोटिंग का टाइम आया तो वे टूटकर बिखर गए.
सात में से 6 निगमों पर बीजेपी काबिज हो गई
राजस्थान के 309 नगरीय निकायों में से 10 नगर निगम हैं. इनमें अभी सात नगर निगमों भरतपुर, भीलवाड़ा, उदयपुर, अजमेर, पाली, बीकानेर और अलवर में निकाय प्रमुखों के चुनाव हो चुके हैं. इनमें से भीलवाड़ा और भरतपुर में चुनाव से पहले मेयर पद पर बीजेपी प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हो चुके थे. उदयपुर में बीजेपी के पास बहुमत था. लिहाजा उसे वहां अपना मेयर बनाने में कोई दिक्कत नहीं आई. कांग्रेस के पास केवल बीकानेर नगर निगम में बहुमत था. इसलिए वह वहां अपना मेयर बनाने में कामयाब हो गई.
कांग्रेस बहुमत के आंकड़े 41 से महज 4 अंक दूर थी
शेष अजमेर और पाली कांग्रेस बढ़त में थी लेकिन उसके बावजूद वह दोनों में ही अपना मेयर नहीं बना सकी. 80 वार्डों वाले अजमेर में कांग्रेस के पास 37 पार्षद थे. वहीं बीजेपी के पास 32 और 11 निर्दलीय पार्षद जीते थे. यहां कांग्रेस बहुमत के आंकड़े 41 से महज 4 अंक दूर थी. उसे पूरी उम्मीद थी कि वह अजमेर में अपना बोर्ड बना लेगी. इसके लिए उसने अजमेर में अपने पार्षदों को एकत्र कर बाड़ाबंदी कर ली. दावा तो यह भी किया जा रहा है कि उसकी बाड़ाबंदी में तीन निर्दलीय पार्षद भी शामिल थे. बाड़ाबंदी में बंद पार्षदों को किसी की नजर ना लग जाए और कोई तोड़फोड़ ना हो इसके लिए कांग्रेस ने अपने सभी पार्षदों को अजमेर या फिर राजस्थान में कहीं रखना मुनासिब नहीं समझा.
कांग्रेस अपने पार्षदों को कर्नाटक ले गई
अजमेर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सीएम अशोक गहलोत के करीब धर्मेन्द्र राठौड़ की देखरेख में उनको फ्लाइट से कर्नाटक ले जाया गया. वहां बंगलुरु में उनकी बाड़ाबंदी की गई. वहां बाड़ेबंदी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के ने भी पार्षदों से मुलाकात की. उसके बाद मतदान से एक दिन पहले रविवार को सभी पार्षदों को जयपुर लाया गया. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल भी पार्षदों के साथ फ्लाइट में जयपुर आए. यहां उनको अशोक गहलोत आवास पर भी ले जाया गया. इस बीच कांग्रेस मुस्लिम वर्ग के दो और पार्षदों पर डोरे डाल रही थी. उसे उम्मीद थी कि वे उसका साथ देंगे और वह अपना बोर्ड बना लेगी.
बीजेपी और कांग्रेस में सीधा मुकाबला थासोमवार को मतदान के दिन उनको एक साथ बस में अजमेर ले जाया गया. वहां सभी ने मेयर पद के लिए मतदान किया. लेकिन कांग्रेस की इतनी कड़ी घेराबंदी भी काम नहीं आई. अजमेर मेयर के लिए कांग्रेस ने किरण गढ़वाल को अपना प्रत्याशी बनाया था. वहीं बीजेपी ने अनामिका शर्मा को मैदान में उतारा था. दोनों के बीच सीधा मुकाबला था. लेकिन वोटिंग में खेल हो गया. बीजेपी को खुद के 32 पार्षदों के अलावा उससे बगावत कर जीते 6 अन्य निर्दलीयों का साथ मिल गया था.
कांग्रेस के साथ चल रहे निर्दलीयों को भी साध लिया
उसके बाद उसने कांग्रेस खेमे में सेंधमारी कर उसके साथ चल रहे निर्दलीयों को भी साध लिया. उन्होंने वोटिंग में बीजेपी का साथ दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि बीजेपी की अनामिका सभी निर्दलीयों के वोट मिल गए. अंतिम परिणाम यह रहा है कि बीजेपी की अनामिका शर्मा को 43 और किरण गढ़वाल को 37 वोट मिले. कांग्रेस के तमाम प्रयासों के बावजूद बीजेपी अपना बोर्ड बनाने में सफल हो गई और हाथ मलती रह गई. अलवर में बीजेपी को बहुमत नहीं था लेकिन वहां बढ़त में थी. लिहाजा उसने वहां भी निर्दलीयों को साध कर अपना बोर्ड बना लिया.



