संघर्ष के बीच चेहरे पर अच्छी आमदनी की उम्मीद, ‘लोकल फॉर वोकल’ को दे रहे बढ़ावा

Last Updated:October 28, 2026, 09:14 IST
Clay Lamp Pottery In Bundi: बूंदी जिले के ठिकरदा पॉटरी विलेज में 25 से 30 कुम्हार परिवार दीपोत्सव की तैयारियों में दिन-रात जुटे हैं. बाजार की चाइनीज लाइटों से दूर यहाँ पारंपरिक तरीके से मिट्टी के दीये, मटके और करवे बनाए जा रहे हैं. बुजुर्ग हीरालाल, सुगना बाई, हनुमान और भगवान प्रजापत का पूरा परिवार तड़के से चाक चलाने और मांडणा बनाने में लगा है. कुम्हार समाज ‘लोकल फॉर वोकल’ को बढ़ावा देते हुए परंपरा को सहेज रहा है और इस दीपोत्सव बेहतर आमदनी तथा हर घर में अपने दीयों के जलने की उम्मीद लगाए बैठा है.
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Bundi Clay Lamp Pottery: बूंदी के ठिकरदा में दीपोत्सव की खुशियां संवार रहा कुम्हार समाज, मिट्टी के दीयों से उम्मीद की रोशनी
बूंदी: दीपावली का पावन त्योहार बेहद नजदीक है और जहाँ पूरा शहर सजने-संवरने को तैयार हो रहा है, वहीं बूंदी जिले का सुप्रसिद्ध पॉटरी विलेज ‘ठिकरदा’ दीपोत्सव की तैयारियों में दिन-रात जुटा हुआ है. बाजार में भले ही रंग-बिरंगी चाइनीज और आधुनिक लाइटों की चकाचौंध हो, बड़े-बड़े शोरूम पर महंगी लाइटें बिक रही हों, लेकिन इस चकाचौंध से दूर ठिकरदा गाँव में मिट्टी को एक नया आकार दिया जा रहा है. यहाँ बन रहे दीये न केवल सदियों पुरानी परंपरा को सहेजे हुए हैं, बल्कि एक पूरे परिवार के संघर्ष और उम्मीद का प्रतीक भी हैं.
ठिकरदा पॉटरी विलेज में रहने वाले 25 से 30 परिवार बड़ी उम्मीद के साथ दीपोत्सव पर दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. सुबह तड़के उठकर देर रात तक पूरा परिवार मिट्टी के कामों में व्यस्त रहता है. परिवार के मुखिया चाक चलाकर दीये और मटके तैयार करते हैं, तो वहीं बुजुर्ग और महिलाएं उन्हें सुंदर और आकर्षक बनाने के लिए उन पर पारंपरिक मांडणा व नक्काशी का काम करती हैं. बुजुर्ग कारीगर हीरालाल प्रजापत बताते हैं कि उनकी कई पीढ़ियाँ इस चाक को चलाते-चलाते बीत गईं. वे बारिश खत्म होते ही 12 महीने से किया जा रहा इंतजार समाप्त कर काम में लग जाते हैं.
करवा चौथ से लेकर दीपोत्सव तक बंपर मांगकारीगरों के अनुसार दीपोत्सव के सीजन में मिट्टी से बने बर्तनों और दीयों की मांग काफी बढ़ जाती है. इस दौरान चाक पर पारंपरिक दीये, मटकी, पूजा के कलश, करवा चौथ के विशेष करवे और सजावटी गुलदस्ते तैयार किए जाते हैं. कारीगर हनुमान प्रजापत और भगवान प्रजापत का कहना है कि काम का दबाव इतना ज्यादा होता है कि पूरे परिवार को कई घंटों तक लगातार मेहनत करनी पड़ती है. वहीं सुगना बाई बताती हैं कि महिलाएं बर्तनों को सुखाने से लेकर उन पर रंग-रोगन और मांडणा बनाने का काम संभालती हैं.
‘लोकल फॉर वोकल’ का संदेश और मिट्टी के दीयों का महत्वप्राचीन काल से ही हर घर को रोशन करने वाले ये मिट्टी के दीपक आज ‘लोकल फॉर वोकल’ अभियान को भी जमीनी स्तर पर बढ़ावा दे रहे हैं. कुम्हार समाज अपनी मेहनत से सदियों पुरानी इस सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखे हुए है. इस दीपोत्सव जब लोग अपने आलीशान घरों को महंगी लाइटों से रोशन करें, तो उन्हें अपने घर के एक कोने में कुम्हार के हाथों से बने मिट्टी के दीये को भी जगह जरूर देनी चाहिए. क्योंकि उस दीये की रोशनी में सिर्फ बाती ही नहीं, बल्कि एक गरीब परिवार की सालभर की उम्मीदें जगमगाती हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Bundi,Bundi,Rajasthan
First Published :
October 28, 2026, 09:12 IST



