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2027 में BSP की वापसी? मायावती के सामने हैं ये 10 सियासी रास्ते.

UP Election 2027: बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसी पार्टी है, जिसने मायावती के नेतृत्व में चार बार सरकार बनाई. लेकिन चारों बार सत्ता तक पहुंचने का रास्ता एक जैसा नहीं था. 1995 और 1997 में BSP गठबंधन और समर्थन की राजनीति के जरिए सरकार में आई, 2002 में भी BJP के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं, जबकि 2007 में पार्टी ने अपने दम पर 206 सीट जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. अब 2027 से पहले BSP एक बार फिर अपने पुराने सामाजिक आधार और संगठन को मजबूत करने में जुटी है. लेकिन इसके साथ बड़ा सवाल यही है कि क्या मायावती फिर उस चुनावी जमीन को तैयार कर रही हैं, जिसने BSP को पहले सत्ता तक पहुंचाया था? 2022 में सिर्फ एक सीट जीतने वाली BSP आखिर किस आधार पर 2027 में वापसी का दावा कर रही है? इसके लिए पूरी कहानी सिलसिलेवार समझते हैं.

चार बार सत्ता, चार अलग-अलग कहानी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसका दलित आधार नहीं रहा, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से सत्ता तक पहुंचने की उसकी क्षमता भी रही है. मायावती पहली बार 3 जून 1995 को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. इसके बाद वह 21 मार्च 1997, 3 मई 2002 और फिर 13 मई 2007 को मुख्यमंत्री बनीं. 2007 का कार्यकाल 15 मार्च 2012 तक चला और यही उनका पहला पूरा पांच साल का कार्यकाल था. यानी अगर 2027 में BSP सत्ता में लौटती है तो वह मायावती के लिए पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनने की कोशिश होगी. लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि पिछली चारों बार सत्ता तक पहुंचने का चुनावी गणित अलग था.

पहली बार 1995 में कैसे बनी सरकार?

BSP की पहली सरकार 1995 में बनी, लेकिन यह किसी विधानसभा चुनाव में BSP के बहुमत हासिल करने का नतीजा नहीं थी. 1993 के विधानसभा चुनाव में BSP और समाजवादी पार्टी ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था. उस समय BSP को 67 सीटें और 11.12 प्रतिशत वोट मिले थे. SP को 109 सीटें मिली थीं और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने थे. करीब डेढ़ साल बाद SP और BSP के रिश्ते बिगड़ गए. 2 जून 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड के बाद BSP ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया. BJP के समर्थन से 3 जून 1995 को मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं. उनका पहला कार्यकाल करीब साढ़े चार महीने चला.

1995 का सबक क्या था?

BSP के लिए सत्ता का पहला रास्ता था सामाजिक आधार + गठबंधन + बदला हुआ राजनीतिक समीकरण. यानी पार्टी के पास बहुमत नहीं था, लेकिन उसके पास इतना राजनीतिक वजन था कि सत्ता बनाने में उसकी भूमिका निर्णायक हो गई.

1997 में फिर सत्ता, इस बार BJP के साथ

1996 के विधानसभा चुनाव में भी किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. इस चुनाव में BSP ने 67 सीटें जीतीं और करीब 19.64 प्रतिशत वोट हासिल किए. BJP 174 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी. करीब पांच महीने तक सरकार बनाने को लेकर गतिरोध रहा. इसके बाद BSP और BJP के बीच समझौता हुआ. इसी समझौते के तहत 21 मार्च 1997 को मायावती दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं. इस बार सत्ता का फॉर्मूला था कि BSP और BJP बारी-बारी से सरकार चलाएंगी. मायावती करीब छह महीने मुख्यमंत्री रहीं और 21 सितंबर 1997 को कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला.

1997 का सबक

1995 में जहां BSP पहली बार सत्ता में आई थी, वहीं 1997 तक उसका वोट शेयर काफी बढ़ चुका था. 1993 में 11.12 प्रतिशत से 1996 में यह बढ़कर 19.64 प्रतिशत हो गया. सीटें जरूर 67 ही रहीं, लेकिन वोट आधार में बड़ा विस्तार हुआ. यानी BSP का राजनीतिक आधार अब सिर्फ एक छोटे सामाजिक समूह तक सीमित नहीं रह गया था.

2002 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं मायावती

2002 का विधानसभा चुनाव BSP की बढ़ती ताकत का अगला पड़ाव था. इस चुनाव में BSP ने 98 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर करीब 23.06 प्रतिशत रहा. SP 143 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, जबकि BJP को 88 सीटें मिली थीं. किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला. इसी राजनीतिक स्थिति में BJP के समर्थन से 3 मई 2002 को मायावती तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं. उनका यह कार्यकाल 29 अगस्त 2003 तक चला. यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है. 1993 में BSP के पास 67 सीट थीं. 1996 में भी 67 सीट थीं. लेकिन 2002 में यह संख्या बढ़कर 98 हो गई. वोट शेयर भी 11.12 प्रतिशत से बढ़ते-बढ़ते 23.06 प्रतिशत तक पहुंच चुका था. यानी 2007 की पूर्ण बहुमत वाली सरकार से पहले BSP कई चुनावों में धीरे-धीरे अपना चुनावी आधार बढ़ा रही थी.

फिर आया 2007, जब BSP ने रचा इतिहास

BSP की पूरी कहानी में 2007 सबसे महत्वपूर्ण चुनाव है. इस चुनाव में मायावती ने किसी दूसरी बड़ी पार्टी के सहारे सरकार बनाने के बजाय अपने दम पर बहुमत हासिल किया. BSP ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 206 सीटें जीतीं. पार्टी का वोट शेयर 30.43 प्रतिशत रहा. यह बहुमत के लिए जरूरी 202 सीटों से चार अधिक था. 13 मई 2007 को मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं. यह उनका सबसे लंबा और सबसे स्थिर मुख्यमंत्री कार्यकाल रहा. वह 15 मार्च 2012 तक मुख्यमंत्री रहीं. यही वह चुनाव था जब BSP की राजनीति में ‘बहुजन से सर्वजन’ की चर्चा सबसे ज्यादा हुई. पार्टी ने अपने पारंपरिक दलित आधार के साथ ब्राह्मणों और दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश की. सतीश चंद्र मिश्रा जैसे ब्राह्मण चेहरे को आगे किया गया और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच राजनीतिक पहुंच बढ़ाई गई. नतीजा यह रहा कि BSP का वोट शेयर करीब 30 प्रतिशत तक पहुंचा और पार्टी ने अकेले दम पर सरकार बना ली.

2007 के बाद कहानी क्यों बदली?

2007 की जीत के बाद BSP 2012 में सत्ता से बाहर हो गई. 2012 में पार्टी की सीटें घटकर 80 रह गईं, हालांकि वोट शेयर करीब 25.91 प्रतिशत था. 2017 में सीटें और घटकर 19 रह गईं, लेकिन BSP का वोट शेयर अभी भी करीब 22.23 प्रतिशत था. फिर 2022 में पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली और उसका वोट शेयर करीब 12.88 प्रतिशत रह गया. यानी 2007 की 206 सीट से 2022 की एक सीट तक BSP का सफर सिर्फ सीटों की गिरावट की कहानी नहीं है. यह उसके वोट आधार में आई कमी की भी कहानी है.

2024 में भी नहीं मिली लोकसभा सीट

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में BSP कोई सीट नहीं जीत सकी. यही वह स्थिति है जहां से 2027 की BSP रणनीति को समझना जरूरी हो जाता है. पार्टी के सामने सवाल सिर्फ सरकार बनाने का नहीं है. पहला सवाल यह है कि क्या वह अपने पुराने चुनावी आधार को फिर से सक्रिय कर सकती है? तो इसका मायावती के पास विकल्प क्या है?

अब जानते हैं कि BSP 2027 में कैसे कर सकती है यूपी की सत्ता में वापसी? मायावती के सामने ये 10 बड़े सियासी रास्ते

दलित वोट को फिर एकजुट करना: BSP की राजनीति का सबसे बड़ा आधार दलित वोट रहा है. इसलिए 2027 में पार्टी के सामने सबसे पहली चुनौती अपने पारंपरिक समर्थकों को अपने साथ बनाए रखने की है. खास तौर पर जाटव के साथ गैर-जाटव दलित समूहों तक संगठन की पहुंच बढ़ाना उसके लिए महत्वपूर्ण होगा.
मुस्लिम समाज में पकड़ बढ़ाना:  BSP ने मुस्लिम समाज तक पहुंच बनाने के लिए मुस्लिम भाईचारा समितियों पर भी जोर दिया है. 2025 में पार्टी ने मंडल स्तर से लेकर बूथ स्तर तक ऐसी समितियों के विस्तार की योजना पर काम शुरू किया था. यह रणनीति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BSP 2027 में किसी बड़े चुनावी गठबंधन के बजाय अपने दम पर सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश करती दिख रही है.
ब्राह्मणों को फिर जोड़ने की कोशिश: 2007 में BSP ने ‘सर्वजन’ की राजनीति के जरिए दलितों के साथ ब्राह्मणों समेत दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़ा था. इस दौर में पार्टी ने ब्राह्मणों के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलनों का इस्तेमाल किया था. 2027 से पहले फिर से इसी तरह के सामाजिक संपर्क की चर्चा BSP की रणनीति में दिखाई दे रही है. हालांकि 2007 के समीकरण को हूबहू दोहराया जा सकेगा या नहीं, यह चुनावी मैदान में अलग-अलग क्षेत्रों के उम्मीदवारों और स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करेगा.
बूथ तक संगठन पहुंचाना: BSP के सामने केवल बड़े नेताओं और रैलियों की राजनीति से आगे बढ़कर बूथ पर मजबूत संगठन खड़ा करने की चुनौती है.सितंबर 2026 में मायावती ने कैडर कैंप और घर-घर संपर्क बढ़ाने पर जोर दिया है. पार्टी का उद्देश्य पुराने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और जमीनी नेटवर्क को मजबूत करने का है.
गैर-जाटव दलितों पर फोकस: BSP का पारंपरिक आधार जाटव समाज में मजबूत रहा है, लेकिन 2027 में सिर्फ इसी आधार पर चुनावी विस्तार करना मुश्किल होगा. इसलिए पार्टी के लिए पासी, वाल्मीकि, कोरी समेत विभिन्न गैर-जाटव दलित समूहों तक पहुंच बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है. टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व में प्रतिनिधित्व इस रणनीति का अहम हिस्सा बन सकता है.
गैर-यादव OBC को साधना: उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में गैर-यादव OBC का महत्व लगातार बना हुआ है. ऐसे में BSP के लिए इस वर्ग के नेताओं और मतदाताओं को अपने साथ जोड़ना एक संभावित रास्ता है. यहां भी सिर्फ जातीय समीकरण काफी नहीं होगा. स्थानीय उम्मीदवार, संगठन और क्षेत्रीय मुद्दे चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित करेंगे.
मजबूत उम्मीदवार उतारना: BSP के लिए 403 सीटों पर उम्मीदवारों का चयन बेहद महत्वपूर्ण होगा. मजबूत स्थानीय उम्मीदवार किसी सीट पर पार्टी के वोट को बढ़ा सकता है, जबकि कमजोर उम्मीदवार होने पर पारंपरिक वोट भी बिखर सकता है. इसलिए टिकट वितरण में जातीय प्रतिनिधित्व के साथ उम्मीदवार की स्थानीय पकड़ भी अहम होगी.
त्रिकोणीय मुकाबले का फायदा: अगर 2027 में BJP, SP-कांग्रेस और BSP के बीच कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय रहता है, तो कम वोट अंतर वाली सीटों पर BSP का प्रदर्शन सीटों के नतीजे पर असर डाल सकता है. लेकिन इसे BSP की जीत का निश्चित फॉर्मूला नहीं कहा जा सकता. त्रिकोणीय मुकाबले में किस पार्टी को फायदा होगा, यह हर विधानसभा क्षेत्र में वोटों के बंटवारे पर निर्भर करेगा.
2007 के शासन रिकॉर्ड को मुद्दा बनाना: BSP 2007 में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना चुकी है. इसलिए 2027 में पार्टी के पास अपने पिछले शासन के रिकॉर्ड को मतदाताओं के सामने रखने का आधार है. मायावती हालिया बयानों में कानून-व्यवस्था और अपनी सरकार के कामकाज को भी राजनीतिक मुद्दा बनाती रही हैं. सितंबर 2026 में उन्होंने SP के PDA अभियान पर निशाना साधते हुए BSP के शासन और ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की बात दोहराई.
संगठन में स्थिरता और नया नेतृत्व: BSP के लिए चुनावी रणनीति के साथ संगठनात्मक स्थिरता भी अहम होगी. सितंबर 2026 में मायावती ने पार्टी के भीतर कई अहम बदलाव किए हैं. आकाश आनंद और दीपिका आनंद को पार्टी में पदों से हटाने के साथ ईशान आनंद को नई जिम्मेदारी देने का फैसला भी इसी दौर में हुआ. इससे 2027 से पहले BSP के संगठन और नेतृत्व को लेकर बदलाव का दौर साफ दिखाई देता है.

तो क्या BSP पांचवीं बार सरकार बना सकती है?

इसका जवाब अभी चुनावी नतीजे आने से पहले निश्चित तौर पर नहीं दिया जा सकता. इतना जरूर कहा जा सकता है कि BSP 2027 से पहले अपने पुराने सामाजिक आधार को फिर सक्रिय करने, मुस्लिम समाज तक पहुंच बढ़ाने, ब्राह्मण और अन्य सामाजिक समूहों को जोड़ने तथा बूथ संगठन मजबूत करने की कोशिश कर रही है. सितंबर 2026 में पार्टी की बैठकों और कैडर अभियान से यह तैयारी दिखाई भी दे रही है. BSP के सामने असली परीक्षा यही होगी कि संगठनात्मक तैयारी को वह कितने वास्तविक वोट में बदल पाती है और अलग-अलग विधानसभा सीटों पर उसका सामाजिक गठजोड़ कितना प्रभावी रहता है.

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