85 की उम्र में भी मिट्टी से मोह, 70 साल से खिलौने बेच रहीं हसकी देवी, प्लास्टिक के दौर में सहेज रहीं विरासत

पाली. “उम्र 85 साल… माथे पर झुर्रियों का जाल, हाथों में कांपती थरथराहट और आंखों में एक बेबस इंतजार…” पाली के प्रतापनगर लेबर कोर्ट के बाहर फुटपाथ पर बैठी इस बुजुर्ग महिला को गौर से देखिए. ये हैं 85 वर्ष की हसकी देवी. पिछले 70 सालों से जी हां, सात दशकों से इनका ठिकाना यही फुटपाथ है. जब पाली की सड़कें कच्ची हुआ करती थी, जब बच्चों की खुशिया प्लास्टिक की मोहताज नहीं थीं, तब से हसकी देवी मिट्टी को तराशकर उसमें जिंदगी के रंग भर रही हैं. इनकी दुकान पर आज भी वही पुराने दिन ज़िंदा है.
मिट्टी के नन्हे गुल्लक, छोटे-छोटे बर्तन और वो मिट्टी के हाथी-घोड़े… जिन्हें खरीदने के लिए कभी बच्चे अपने माता-पिता का हाथ पकड़कर जिद किया करते थे. क्योंकि अब आधुनिक युग है और ऐसे में बच्चे अब प्लास्टिक के खिलौने के साथ वीडियों गेम से ही बाहर नहीं आ पाते. ऐसे में माटी के मिलने वाले इन खिलौनो का दौर जरूर खत्म हो गया, मगर यह महिला आज भी माटी की सदियों पुरानी उस संस्कृति को बचाने का काम आज भी करती दिखाई दे रही हैं.
बेजान प्लास्टिक के खिलौने ने ली मिट्टी की जगह
अब जमाना बदल गया है और मिट्टी के हाथी-घोड़ों की जगह बेजान प्लास्टिक के खिलौनों ने ले ली. अब न वो बच्चों की जिद रही, न मिट्टी की खुशबू के कद्रदान. हसकी देवी कहती हैं ’अब लोग खरीदने नहीं आते… पर क्या करूं, मिट्टी से प्यार है, जब तक सांसें हैं, अपनी संस्कृति को सहेजती रहूंगी.’
जरा झांककर देखिए इस बुजुर्ग की थकी आंखों में
सोचिए, जिस उम्र में हाथ में लाठी और अपनों का सहारा होना चाहिए था, उस उम्र में यह मां हर सुबह उसी आस में दुकान सजाती है कि शायद आज कोई बच्चा मिट्टी का एक खिलौना मांग ले. बच्चों की खुशियों के लिए दिन-रात माटी गूंथने वाली इस मां की आंखों में झांककर देखिए… वहां गरीबी का रोना नहीं, बल्कि अपनी मरती हुई कला और बदलते वक्त का वो दर्द है, जो किसी भी पत्थर दिल को पिघला दे.
आज भी इसी आस में है कि कोई खरीदने आएगा
हसकी देवी ने लोकल-18 से बातचीत में बताया कि मुझे 70 साल का समय हो गया दुकान लगाते हुए. ये खिलौने अब नहीं मिलते. माटी के खिलौने अब मिलना मुश्किल है. हमारे बुजुर्ग यह बनाया करते थे, जिसको आज भी बना रहे हैं. मगर आने वाली पीढियां इस काम को अब आगे नहीं बढाएंगी. अब तो प्लास्टिक के ही खिलौने मिलते है. मैं पुरानी हूं जो आज भी यहां बैठी हूं. अब पहले की तरह इसको कोई लेने के लिए नहीं आता.



