भरतपुर किसानों का देसी जुगाड़ | Desi Jugaad to Save Crops Bharatpur Agriculture Tips

Last Updated:December 31, 2025, 09:57 IST
Desi Jugaad to Save Crops: भरतपुर के किसान पुरानी साड़ियों. खाली डिब्बों और मटकों की मदद से देसी जुगाड़ तैयार कर अपनी गेहूं की फसल को आवारा पशुओं से बचा रहे हैं. यह तरीका न केवल सस्ता है बल्कि पशुओं को डराने में बहुत प्रभावी भी साबित हो रहा है.
भरतपुर जिले के किसान इन दिनों अपनी गेहूं की फसल को आवारा पशुओं से बचाने के लिए एक अनोखा और पूरी तरह देसी तरीका अपना रहे हैं. लगातार बढ़ते निराश्रित पशुओं के कारण किसानों की फसलों को भारी नुकसान हो रहा है. ऐसे में महंगे उपायों के बजाय किसान अब पारंपरिक और सस्ते जुगाड़ पर भरोसा कर रहे हैं, जो काफी कारगर साबित हो रहा है.

इस देसी उपाय का नाम है ‘बिजूका’. बिजूका दरअसल पुराने कपड़ों से बनाया गया आदमी के आकार का एक पुतला होता है, जिसे खेत के बीचों-बीच या किनारों पर खड़ा कर दिया जाता है. दूर से देखने पर यह बिल्कुल इंसान जैसा दिखाई देता है. खेत की ओर आने वाले पशु जैसे नीलगाय, गाय, सांड और अन्य आवारा जानवर इसे असली इंसान समझकर डर जाते हैं और खेत में घुसने से पहले ही वापस लौट जाते हैं.

किसानों का कहना है.कि बीजुका बनाने में किसी तरह का कोई खर्च नहीं आता पुराने कपड़े लकड़ी या बांस की दो-तीन खपच्चियां और थोड़ी सी मेहनत से यह आसानी से तैयार हो जाता है.कुछ किसान इसके सिर पर टोपी लगाते हैं.तो कुछ शर्ट-पैंट पहनाकर इसे और वास्तविक रूप देते हैं.ताकि पशुओं को लगे कि खेत में कोई व्यक्ति खड़ा है.भरतपुर के कई गांवों में यह तरीका बड़े पैमाने पर अपनाया जा रहा है.
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किसानों के अनुसार, रात के समय जब पशुओं का फसलों पर हमला बढ़ जाता है, तब बिजूका सबसे अधिक असरदार साबित होता है. पशुओं को भ्रमित रखने के लिए किसान चतुर रणनीति भी अपनाते हैं; वे समय-समय पर बिजूका का स्थान बदल देते हैं या उसके कपड़े बदल देते हैं, ताकि जानवर इसे निर्जीव वस्तु न समझ लें और उन्हें इसकी आदत न पड़े. किसानों का यह भी कहना है कि इस सरल तकनीक की मदद से अब उन्हें काफी राहत मिली है, जबकि पहले अपनी फसलों को बचाने के लिए उन्हें कड़ाके की ठंड में रात-रात भर खेतों में जागकर पहरा देना पड़ता था.

इससे न केवल थकान बढ़ती थी, बल्कि समय और मेहनत भी अधिक खर्च होती थी, लेकिन अब बिजूका की मदद से किसानों को काफी राहत मिली है और उनकी फसल भी सुरक्षित रहती है. यह पारंपरिक तरीका पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है और किसी भी प्रकार के नियम-कानून का उल्लंघन नहीं करता. इसमें न तो बिजली के करंट का खतरा है, न ही कंटीले तारों की जरूरत और न ही किसी जीव-जंतु को कोई शारीरिक नुकसान पहुँचता है.

इसमें पशु को नुकसान पहुँचाने वाले किसी भी साधन का इस्तेमाल नहीं होता है. कुल मिलाकर, भरतपुर के किसान अपने अनुभव और समझदारी से इस देसी जुगाड़ को अपनाकर गेहूं की फसल की प्रभावी सुरक्षा कर रहे हैं. यह तरीका न केवल सस्ता है, बल्कि सरल और अहिंसक भी है, जो अन्य क्षेत्रों के किसानों के लिए भी एक बेहतरीन मिसाल बन सकता है.
First Published :
December 31, 2025, 09:57 IST
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आवारा पशुओं की अब खैर नहीं! किसानों ने खोजा फसलों को बचाने का गजब देसी जुगाड़



