यहीं सीखा था स्वाभिमान और संघर्ष का पाठ! जानिए मोती महल की वो कहानी, जहां बीता महाराणा प्रताप का बचपन

Last Updated:June 17, 2026, 13:41 IST
Maharana Pratap Jayanti: महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास से जुड़ा मोती महल विशेष महत्व रखता है. कुंभलगढ़ दुर्ग स्थित यह ऐतिहासिक महल वह स्थान माना जाता है, जहां वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने अपने बचपन के महत्वपूर्ण वर्ष बिताए थे. राजपूताना संस्कृति, अनुशासन, युद्धकौशल और स्वाभिमान के संस्कारों से परिपूर्ण इस वातावरण ने उनके व्यक्तित्व को आकार देने में अहम भूमिका निभाई. अरावली की पहाड़ियों से घिरे कुंभलगढ़ के सुरक्षित और प्रेरणादायक माहौल में महाराणा प्रताप ने साहस, नेतृत्व और मातृभूमि के प्रति समर्पण की सीख प्राप्त की. यही संस्कार आगे चलकर उन्हें मुगल सत्ता के सामने अडिग रहने वाला महान योद्धा बनाते हैं. आज मोती महल केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि मेवाड़ के गौरव, त्याग और स्वाभिमान का प्रतीक है.
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उदयपुर: वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती पर पूरे मेवाड़ में उत्साह और गौरव का माहौल है. इस अवसर पर इतिहास के उन स्थलों की चर्चा भी हो रही है, जिनका महाराणा प्रताप के जीवन से गहरा संबंध रहा है. ऐसा ही एक महत्वपूर्ण स्थल है उदयपुर की मोती मंगरी पर स्थित मोती महल, जिसे महाराणा प्रताप के बचपन और युवावस्था की यादों का साक्षी माना जाता है.अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित यह ऐतिहासिक महल आज भी मेवाड़ के स्वाभिमान, साहस और संघर्ष की गाथा सुनाता है. इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप ने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष यहीं बिताए थे.
इसी परिसर में उन्होंने शस्त्र संचालन, घुड़सवारी और युद्ध कौशल की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की थी. यही वह स्थान माना जाता है, जहां उनके व्यक्तित्व में स्वाभिमान, राष्ट्रप्रेम और मातृभूमि की रक्षा के संस्कार मजबूत हुए. मोती महल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास का जीवंत प्रतीक है. महल परिसर में स्थित प्राचीन शिव मंदिर भी विशेष महत्व रखता है. मान्यता है कि महाराणा प्रताप यहां नियमित रूप से भगवान शिव की आराधना किया करते थे. इसके अलावा परिसर में चित्तौड़गढ़ के प्रसिद्ध कीर्ति स्तंभ की तर्ज पर निर्मित एक स्तंभ भी मौजूद है, जो मेवाड़ की स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करता है.
मेवाड़ ने कभी भी अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं कियामहाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग मोती मंगरी पहुंचकर इस ऐतिहासिक धरोहर को निहार रहे हैं. युवाओं और पर्यटकों में भी इस स्थल को लेकर विशेष उत्सुकता देखी जा रही है. कई लोग यहां पहुंचकर महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़े प्रसंगों को जानने और समझने का प्रयास कर रहे हैं. इतिहासकार चंद्रशेखर शर्मा बताते हैं कि महाराणा प्रताप केवल मेवाड़ ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए स्वाभिमान और स्वतंत्रता के प्रतीक हैं. उन्होंने कहा कि हल्दीघाटी के युद्ध में जिस साहस और दृढ़ता के साथ महाराणा प्रताप ने मुगल सेना का सामना किया, वह इतिहास में अद्वितीय है. उनके साथियों और भील समुदाय के योगदान ने भी इस संघर्ष को अमर बना दिया. उन्होंने कहा कि मेवाड़ ने कभी भी अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया.
यही कारण है कि महाराणा प्रताप और उनकी कर्मभूमि से जुड़े स्थल आज भी देश-दुनिया के लोगों को प्रेरित करते हैं. मोती महल भी उन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है, जो आने वाली पीढ़ियों को मेवाड़ की वीरता, त्याग और गौरव की अमर गाथा से परिचित कराता है.
About the AuthorJagriti Dubey
Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें
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