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Last Updated:June 30, 2026, 11:08 IST

Udaipur Rajsamand Jheel Story: राजस्थान की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल राजसमंद झील सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने अनोखे इतिहास के कारण भी खास पहचान रखती है. बहुत कम लोग जानते हैं कि वर्ष 1930 से 1940 के बीच लंदन से सिडनी जाने वाली फ्लाइंग बोट्स इस झील पर ईंधन भरने और तकनीकी जांच के लिए उतरती थीं. यही नहीं, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय वायु सेना ने भी इस झील का उपयोग सैन्य गतिविधियों और प्रशिक्षण के लिए किया था. 17वीं शताब्दी में महाराणा राज सिंह प्रथम द्वारा बनवाई गई यह झील आज भी मेवाड़ की शान मानी जाती है. झील के किनारे बने नौ चौकी घाट, संगमरमर की शानदार नक्काशी, ऐतिहासिक छतरियां और धार्मिक महत्व इसे राजस्थान के सबसे खास पर्यटन स्थलों में शामिल करते हैं. मानसून के दौरान इसका नजारा और भी आकर्षक हो जाता है. जानिए राजसमंद झील से जुड़ी वे ऐतिहासिक बातें, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं और जो इसे राजस्थान की सबसे अनोखी झीलों में शामिल करती हैं.

राजस्थान की ऐतिहासिक झीलों की बात हो और राजसमंद झील का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. मेवाड़ की यह ऐतिहासिक झील सिर्फ अपनी सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने गौरवशाली इतिहास के लिए भी जानी जाती है. एक समय ऐसा था जब वर्ष 1930 से 1940 के बीच लंदन से सिडनी जाने वाली फ्लाइंग बोट्स (पानी पर उतरने वाले हवाई जहाज) राजसमंद झील में ईंधन भरने के लिए उतरती थीं. यही नहीं, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय वायु सेना ने भी इस झील का उपयोग अपने अभियानों के लिए किया था. यही वजह है कि राजसमंद झील इतिहास और विरासत का अनोखा संगम मानी जाती है.

राजसमंद झील का निर्माण मेवाड़ के शासक महाराणा राज सिंह प्रथम ने 17वीं शताब्दी में कराया था. करीब 1662 से 1676 के बीच बने इस विशाल जलाशय का उद्देश्य क्षेत्र में पेयजल और सिंचाई की व्यवस्था करना था. महाराणा के नाम पर ही इस झील का नाम “राजसमंद” रखा गया. वर्षों से यह झील मेवाड़ की पहचान बनी हुई है और आज भी हजारों लोग इसकी भव्यता देखने पहुंचते हैं.

राजसमंद झील का सबसे रोचक अध्याय 1930 और 1940 के दशक से जुड़ा है. उस समय लंबी दूरी की हवाई यात्राओं के लिए इस्तेमाल होने वाली फ्लाइंग बोट्स को बीच रास्ते में ईंधन भरने और तकनीकी जांच की जरूरत पड़ती थी. लंदन से सिडनी जाने वाले इस अंतरराष्ट्रीय हवाई मार्ग में राजसमंद झील एक महत्वपूर्ण पड़ाव हुआ करता था. पानी के विशाल विस्तार और सुरक्षित वातावरण के कारण ये विमान यहां आसानी से उतरते थे. उस दौर में यह झील अंतरराष्ट्रीय विमानन इतिहास का भी हिस्सा बन चुकी थी.

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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस झील का महत्व और बढ़ गया. भारतीय वायु सेना ने भी राजसमंद झील का उपयोग प्रशिक्षण और अन्य आवश्यक सैन्य गतिविधियों के लिए किया. उस समय यह झील केवल जल स्रोत नहीं रही, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी उपयोगी साबित हुई. आज भले ही यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है, लेकिन स्थानीय लोग आज भी इस गौरवशाली अतीत को गर्व के साथ याद करते हैं.

राजसमंद झील अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है. झील के किनारे बने नौ चौकी घाट पर संगमरमर की शानदार कलाकृतियां आज भी लोगों को आकर्षित करती हैं. यहां पांच तुलादान और तीन सुंदर मंडप (छतरियां) बने हुए हैं. इन पर की गई बारीक नक्काशी इतनी आकर्षक है कि इसकी तुलना अक्सर दिलवाड़ा जैन मंदिर की शिल्पकला से की जाती है. इतिहास और स्थापत्य कला में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए यह स्थान खास आकर्षण का केंद्र है.

राजसमंद झील राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की झील मानी जाती है. इस सूची में पहला स्थान जयसमंद झील का है. मानसून के दौरान जब झील पूरी तरह भर जाती है तो इसका नजारा बेहद मनमोहक दिखाई देता है. बड़ी संख्या में पर्यटक यहां सूर्योदय और सूर्यास्त का खूबसूरत दृश्य देखने पहुंचते हैं.इसके साथ ही यह झील स्थानीय लोगों की जल आवश्यकताओं और पर्यटन, दोनों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

राजसमंद झील केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि मेवाड़ के इतिहास, संस्कृति और गौरव की जीवंत पहचान है.पानी के हवाई जहाजों की लैंडिंग से लेकर शाही स्थापत्य और ऐतिहासिक धरोहर तक, इस झील का हर कोना एक अलग कहानी सुनाता है.यही कारण है कि राजसमंद झील आज भी इतिहास प्रेमियों, पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है.

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