बहन की याद में बदली परंपरा, मृत्यु भोज पर खर्च नहीं किए रुपये, बैरवा भाइयों ने स्कूल को दिए 1.11 लाख

चित्तौड़गढ़. राजस्थान के चित्तौड़गढ़ और भीलवाड़ा के बीच बसे सामाजिक रिश्तों की जमीन से बदलाव की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसमें शोक को सामाजिक दिखावे के बजाय शिक्षा से जोड़ने की कोशिश की गई. भीलवाड़ा शहर के नजदीक जितिया खेड़ी गांव निवासी बैरवा परिवार ने अपनी बड़ी बहन नंदू देवी बैरवा की मृत्यु के बाद मृत्यु भोज नहीं कराने का फैसला किया. परिवार ने इस परंपरा में होने वाले खर्च को जरूरतमंद और आने वाली पीढ़ी के काम लाने का निर्णय लिया. इसी सोच के साथ राजस्थान पुलिस में कार्यरत कालू लाल बैरवा और भारतीय सेना में तैनात उनके छोटे भाई गोपाल बैरवा आगे बढ़ाया.
कालू लाल बैरवा और उनके छोटे भाई गोपाल बैरवा ने 1 लाख 11 हजार 111 रुपये की राशि विद्यालय को आर्थिक सहयोग के रूप में भेंट की. दोनों भाइयों का यह कदम इसलिए भी खास है, क्योंकि उन्होंने अपनी बहन की स्मृति को किसी आयोजन या दिखावे से नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा से जोड़ने का फैसला किया. परिवार का मानना है कि किसी दिवंगत व्यक्ति की स्मृति को लंबे समय तक जीवित रखने का सबसे बेहतर माध्यम शिक्षा में योगदान हो सकता है.
बहन की याद में बदल डाली वर्षो से चली आ रही परंपरा
कालू लाल बैरवा ने बताया कि बड़ी बहन नंदू देवी बैरवा की मृत्यु के बाद परिवार के सामने मृत्यु भोज कराने की पारंपरिक व्यवस्था थी. लेकिन परिवार ने इस परंपरा को निभाने के बजाय कुछ अलग करने पर विचार किया. बातचीत के बाद तय किया गया कि मृत्यु भोज में होने वाले खर्च को शिक्षा के काम में लगाया जाएगा. इसी निर्णय के तहत दोनों भाइयों ने विद्यालय को 1,11,111 रुपये की राशि देने का संकल्प लिया. परिवार का कहना है कि मृत्यु भोज जैसी परंपराओं में बड़ी राशि खर्च होने के बाद उसका लाभ सीमित समय तक ही रहता है, जबकि शिक्षा के लिए किया गया सहयोग लंबे समय तक बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है.
दोनों भाईयों ने समाज की सोच बदलने वाला कदम उठाया
इस पहल को खास बनाने वाली बात यह भी है कि परिवार के दो सदस्य देश और प्रदेश की सेवा से जुड़े हुए हैं. कालू लाल बैरवा राजस्थान पुलिस में भीलवाड़ा के भीमगंज थाने में तैनात हैं, जबकि उनके छोटे भाई गोपाल बैरवा भारतीय सेना में कार्यरत हैं. दोनों ने अपनी बहन की स्मृति में ऐसा निर्णय लिया, जिसका असर परिवार से आगे समाज तक पहुंचे. कालू लाल बैरवा ने इस सोच की प्रेरणा अपने बड़े भाई सूरज कुमार बैरवा से मिलने की बात कही. सूरज कुमार चित्तौड़गढ़ पुलिस में सहायक उप निरीक्षक के पद पर कार्यरत हैं. इसके अलावा उन्होंने अपने स्व. फूफाजी रामलाल बैरवा को भी अपना आदर्श बताया.
शोक को शिक्षा से जोड़ने का किया पहल
परिवार की ओर से विद्यालय को दी गई 1 लाख 11 हजार 111 रुपये की राशि का उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग करना है. इस दौरान विद्यालय परिवार, ग्रामीणों और कई गणमान्य लोगों की मौजूदगी रही. विद्यालय प्रशासन ने बैरवा परिवार के इस सहयोग के लिए आभार जताया. विद्यालय परिवार का कहना है कि इस तरह का सहयोग विद्यार्थियों की जरूरतों को पूरा करने और शैक्षणिक माहौल को बेहतर बनाने में उपयोगी साबित हो सकता है. वहीं ग्रामीणों ने भी परिवार के निर्णय की सराहना की.
मृत्यु भोज की जगह शिक्षा का दिया संदेश
बैरवा परिवार के इस फैसले ने सामाजिक कुरीतियों के बीच एक वैकल्पिक रास्ता दिखाने का काम किया है. परिवार ने यह संदेश देने की कोशिश की कि किसी अपने के जाने के बाद होने वाला खर्च सिर्फ रस्म निभाने में ही नहीं, बल्कि समाज के भविष्य को संवारने में भी लगाया जा सकता है. चित्तौड़गढ़ से लेकर भीलवाड़ा तक इस पहल की चर्चा हो रही है. परिवार के लिए यह राशि महज आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि नंदू देवी बैरवा की स्मृति को शिक्षा और आने वाली पीढ़ी से जोड़ने का माध्यम है. परिवार की इस पहल ने यह सवाल भी सामने रखा है कि परंपराओं को निभाने के साथ क्या उन्हें समाजहित के अनुरूप नया रूप नहीं दिया जा सकता.



