Rajasthan

Rajasthan Nikay Chunav | Who Is Winning Rajasthan Mayor

जयपुर. राजस्थान के 309 शहरी निकायों के चुनाव में पार्षदों का फैसला आने के बाद अब असली सियासी हलचल मेयर, सभापति और अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर है. कई जगह तस्वीर साफ है, तो कई नगर निगम और नगर पालिकाओं में बहुमत का आंकड़ा पूरा करने के लिए निर्दलीय पार्षदों की जरूरत पड़ रही है. जहां पार्टी के पास अपने दम पर संख्या नहीं है, वहां पार्षदों की बाड़ेबंदी से लेकर मान-मनुहार तक का दौर चल रहा है.

नगर निगमों की बात करें तो बीजेपी ने जयपुर, कोटा, उदयपुर और भीलवाड़ा में बहुमत हासिल किया है. वहीं बीकानेर में कांग्रेस को साफ बहुमत मिला है. अजमेर और पाली में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आई है, जबकि जोधपुर में बीजेपी और कांग्रेस बराबरी पर थीं और भरतपुर में निर्दलीयों का दबदबा रहा. यही वजह है कि 10 नगर निगमों में मेयर की तस्वीर हर जगह एक जैसी नहीं है.

बीकानेर में कांग्रेस के पास बहुमत, फिर भी अपनों से परेशानी
बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस के पास 42 पार्षद हैं, जबकि बीजेपी के 27 और निर्दलीयों के 11 पार्षद हैं. संख्या के हिसाब से कांग्रेस के पास मेयर बनाने के लिए बहुमत मौजूद है. कांग्रेस ने पूर्व मंत्री बीडी कल्ला के भतीजे अनिल कल्ला को मेयर पद का उम्मीदवार बनाया है. लेकिन यहां पेंच पार्टी के अंदर ही फंस गया. कांग्रेस पार्षद नवरतन डागा ने बगावत करते हुए निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल कर दिया. बीजेपी ने भी इस स्थिति को देखते हुए सुरेंद्र सिंह शेखावत को मैदान में उतारा. कांग्रेस ने अपने पार्षदों को एक रिसोर्ट में बाड़ेबंदी में रखा है. वहां पार्षदों को बाहर जाने और मोबाइल रखने या बात करने की इजाजत नहीं होने की बात सामने आई है. यानी बीकानेर में कांग्रेस के पास संख्या तो है, लेकिन पार्टी अपने ही पार्षदों को लेकर पूरी तरह निश्चिंत नहीं है.

पाली में कांग्रेस की बढ़त, लेकिन बागी ने बढ़ाया पेंच
पाली में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही है. यहां कांग्रेस के 29 पार्षद हैं, बीजेपी के 21 और 15 निर्दलीय हैं. कांग्रेस ने सुमित्रा जैन को मेयर पद के लिए उम्मीदवार बनाया है. लेकिन कांग्रेस की बागी राजबाला हिंगड़ ने भी मैदान में उतरकर मुकाबला बदल दिया. राजबाला हिंगड़ के साथ कांग्रेस के कुछ पार्षदों के समर्थन की बात सामने आई है. ऐसे में कांग्रेस को अपने ही खेमे को संभालने की चुनौती है. पाली में सियासी तनाव उस समय और बढ़ गया जब कांग्रेस विधायक के भाई लक्ष्मण भाटी सिंबल लौट रहे थे. आरोप है कि एक गुट के लोगों ने उनके साथ मारपीट की और कपड़े फाड़ दिए.

भरतपुर में कांग्रेस ने खुद उम्मीदवार नहीं उतारा
भरतपुर नगर निगम का मामला बाकी शहरों से अलग है. यहां 65 वार्डों में 36 निर्दलीय जीते हैं. बीजेपी के 20, कांग्रेस के 7, बीएसपी के एक और आरएलपी के एक पार्षद हैं. ऐसे में निर्दलीयों की संख्या सबसे ज्यादा है. मेयर पद के लिए वार्ड 17 की निर्दलीय पार्षद विचित्रा सिंह और वार्ड 61 की बीजेपी पार्षद अनुराधा सिंह ने नामांकन दाखिल किया है. कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार मैदान में उतारने के बजाय निर्दलीय विचित्रा सिंह को समर्थन दिया है. यानी भरतपुर में कांग्रेस सीधे मुकाबले से बाहर रहकर अपना समीकरण बनाने की कोशिश में है.

जोधपुर में बराबरी टूटी, अब निर्दलीय अहम
जोधपुर नगर निगम में 100 वार्डों के नतीजों में बीजेपी और कांग्रेस 44-44 सीटों पर बराबर थीं. 10 सीटें निर्दलीयों के खाते में थीं. बाद में वार्ड 50 में दोबारा मतदान कराया गया. बीजेपी के हेमाराम ने यह सीट 83 वोटों से जीती. इसके साथ बीजेपी के पास 45 और कांग्रेस के पास 44 सीटें हो गईं. अब भी बीजेपी के पास अपने दम पर बहुमत नहीं है. ऐसे में 10 निर्दलीय और एक आरएलपी पार्षद की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है. यहां मेयर की कुर्सी तक पहुंचने के लिए दोनों दलों को इन पार्षदों का समर्थन जुटाना होगा.

अजमेर में कांग्रेस का जोड़-तोड़ का खेल
अजमेर नगर निगम में कांग्रेस के 37 पार्षद हैं, बीजेपी के 32 और निर्दलीयों के 11. कांग्रेस ने अपने पार्षदों के साथ चार निर्दलीय पार्षदों को भी बाड़ेबंदी में रखने की तैयारी की है. कांग्रेस की ओर से निर्दलीयों के समर्थन का दावा भी किया गया है. मेयर चुनाव को लेकर यहां नामांकन के दौरान भी विवाद हुआ. कांग्रेस ने अपनी मेयर उम्मीदवार का पर्चा गलत तरीके से खारिज किए जाने की आशंका जताते हुए विरोध किया. दूसरी ओर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही निर्दलीयों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में हैं.

जयपुर में बीजेपी बहुमत के आंकड़े से आगे
जयपुर नगर निगम में बीजेपी ने 78 सीटें जीती हैं. 150 सीटों वाले निगम में यह बहुमत के आंकड़े से दो ज्यादा है. बाद में कुछ बूथों पर दोबारा मतदान हुआ, जिसमें कांग्रेस ने चारों सीटें जीत लीं. इसके बाद कांग्रेस ने बीजेपी पर अपने पार्षदों को तोड़ने की कोशिश का आरोप लगाया. बीजेपी के लिए जयपुर में संख्या मजबूत है, लेकिन चुनाव से पहले की सियासी गतिविधियां यहां भी तेज हैं. राज्यभर में दोनों दल अपने पार्षदों को साथ रखने की कोशिश कर रहे हैं.

भीलवाड़ा में बीजेपी के लिए तस्वीर साफ
भीलवाड़ा उन नगर निगमों में है जहां बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला है. 70 वार्डों में बीजेपी ने 45 सीटें जीती हैं. मेयर पद के लिए बीजेपी की जसवंत कंवर का निर्विरोध चुना जाना तय हो गया, क्योंकि कांग्रेस की ओर से कोई पार्षद नामांकन दाखिल करने नहीं पहुंचा और मुकाबले में बीजेपी उम्मीदवार के सामने निर्दलीय उम्मीदवार रहा. उदयपुर और कोटा में भी बीजेपी ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है. इन शहरों में मेयर बनाने के लिए निर्दलीयों पर निर्भरता की स्थिति बाकी निगमों जैसी नहीं है.

छोटे निकायों में भी निर्दलीय बना रहे समीकरण
सिर्फ नगर निगमों में ही बाड़ेबंदी और जोड़तोड़ नहीं चल रही. नगर परिषदों और नगर पालिकाओं में भी जहां किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला, वहां निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बढ़ गई है. झुंझुनूं की खेतड़ी नगरपालिका में 25 वार्डों में बीजेपी के 8, कांग्रेस के 4 और निर्दलीयों के 13 पार्षद जीते. कांग्रेस से जीतीं गीता सैनी बीजेपी में शामिल हो गईं और पालिकाध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल कर दिया. इससे यहां भी चुनाव से पहले समीकरण बदल गया. टोंक की दूनी नगरपालिका में बीजेपी के पास बहुमत है, लेकिन कांग्रेस की ओर से पार्षदों को अपने पाले में करने की कोशिशों के बीच बीजेपी ने अपने पार्षदों की बाड़ेबंदी की. इसी दौरान बीजेपी पार्षद अर्चना बड़गूजर बाड़ेबंदी से बाहर निकल आईं. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें नामांकन दाखिल करने से रोका जा रहा है. बाद में उन्हें सरवाड़ के टोल नाके पर रोका गया और पुलिस उन्हें थाने ले गई. उनके समर्थकों ने भी पुलिस पर पर्चा दाखिल करने से रोकने का आरोप लगाया. यह पूरा घटनाक्रम सोशल मीडिया पर भी सामने आया.

बीजेपी ने आरोपों को नकारा, कांग्रेस ने उठाए सवालबाड़ेबंदी और पार्षदों को अपने पाले में करने के आरोपों पर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा कि पार्टी बीकानेर समेत सभी 10 नगर निगमों में बोर्ड बनाएगी. जब उनसे बीकानेर में कांग्रेस के पास बहुमत होने और कांग्रेस पार्षदों को अपने साथ लाने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि कांग्रेस के ही पार्षद उनके साथ आ रहे हैं और निर्दलीय भी समर्थन कर रहे हैं. राठौड़ ने सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और पार्षदों को डराने-धमकाने के आरोपों से इनकार किया. दूसरी ओर कांग्रेस लगातार बीजेपी पर पार्षदों को तोड़ने और सरकारी तंत्र के इस्तेमाल के आरोप लगा रही है. इन आरोपों को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं.

21 सितंबर को होगा असली फैसला
अब पूरा ध्यान 21 सितंबर पर है. इसी दिन नगर निगमों में मेयर और दूसरे निकायों में सभापति व अध्यक्ष पद के लिए पार्षद मतदान करेंगे. कुछ निगमों में बहुमत पहले ही तस्वीर साफ कर चुका है, लेकिन बीकानेर, पाली, अजमेर, जोधपुर और भरतपुर जैसे शहरों में आखिरी समय तक समीकरण बदलने की गुंजाइश बनी हुई है. इस चुनाव में एक बात साफ दिख रही है. जहां पार्टी के पास साफ बहुमत है, वहां रास्ता अपेक्षाकृत सीधा है. लेकिन जहां कुछ सीटों की कमी है, वहां निर्दलीय पार्षदों की अहमियत अचानक बढ़ गई है. इसी वजह से राजस्थान के कई शहरों में पार्षदों की बाड़ेबंदी, रिसोर्ट की तस्वीरें, दल बदल और बागी उम्मीदवारों की चर्चा चुनावी नतीजों के बाद भी खत्म नहीं हुई है. अब देखना यह है कि 21 सितंबर को जब पार्षद वोट डालेंगे तो किस शहर में संख्या का गणित काम करता है और किस शहर में आखिरी वक्त का सियासी खेल पूरा समीकरण बदल देता है.

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj