Somnath Temple Pali: सोमनाथ मंदिर के पास मुस्लिम कारीगर बनाते हैं त्रिशूल, 100 साल पुरानी है ये विरासत

Last Updated:September 20, 2026, 19:15 IST
100 year old shop in Pali:पाली के ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के पास 100 साल पुरानी लोहे की दुकान आज भी गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बनी हुई है. मुस्लिम कारीगरों की पीढ़ियां यहां त्रिशूल, कुपेड़ा और पूजा-पाठ के दूसरे सामान के साथ घरेलू औजार भी तैयार करती आ रही हैं. आज अय्यूब और उनका परिवार दादा-पिता से मिली इस पुश्तैनी विरासत और हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं.
पाली. नफरत और सियासत के बीच जब दुनिया फासले तलाशती है, तब पाली का यह एक छोटा सा कोना मोहब्बत और गंगा-जमुनी तहजीब की एक बेमिसाल मिसाल पेश करता है. पाली के ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर के बिल्कुल पास स्थित है लोहे के औजार बनाने की यह 100 साल पुरानी दुकान. आजादी से पहले शुरू हुआ यह काम आज भी उसी शिद्दत और लगन के साथ जारी है. कभी दादा और पिता ने इस भट्टी को रोशन किया था, और आज उस्मान, इब्राहिम के बाद अब अय्यूब इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. कढ़ाई हो, खुरपी हो या फिर भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक त्रिशूल—इस दुकान में हर औजार लोहे को तपाकर बड़ी बारीकी से तैयार किया जाता है.
यह कोई आम दुकान नहीं है, बल्कि एक सदी (100 साल) पुरानी विरासत है. आजादी से भी पहले शुरू हुआ लोहे को तपाकर औजार बनाने का यह काम आज भी उसी शिद्दत और लगन के साथ जारी है. कभी इनके दादा और पिता ने इस भट्टी को रोशन किया था, और आज उस पुश्तैनी आग और हुनर को उस्मान, इब्राहिम और अय्यूब मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं. इनका 80 साल पुराना मकान आज भी उसी जगह मौजूद है, जिसकी दीवारों पर आज भी ‘1947’ उकेरा हुआ है. यह मकान और यह दुकान सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि पीढ़ियों के उस सफर के गवाह हैं, जिसने बदलते वक्त के साथ भी अपने उसूल और भाईचारा नहीं बदला.
यह है इस दुकान की सबसे खास बातइस दुकान की सबसे खास बात यह है कि यहां हिंदू आस्था के प्रतीक पूरी अकीदत (श्रद्धा) के साथ तैयार किए जाते हैं. 60 वर्षीय अय्यूब बताते हैं कि, “यह काम हमारे दादा और वालिद (पिता) किया करते थे. हम यहां पर घर में काम आने वाली कड़ाही, तवे, चूल्हे और खुरपी जैसी आम चीजों के साथ-साथ भगवान भोलेनाथ की भक्ति का प्रतीक ‘त्रिशूल’ भी बड़ी बारीकी से बनाते हैं.” सिर्फ त्रिशूल ही नहीं, बल्कि मंदिरों में भगवान की आरती के लिए काम आने वाला ‘कुपेड़ा’ भी इन्हीं मुस्लिम भाइयों के हाथों से तपाकर तैयार किया जाता है. सोमनाथ मंदिर के पास गूंजती हथौड़े की यह थाप मानो अजान और आरती का एक मधुर संगम बन जाती है.
पीढ़िया बदली लेकिन नही बदली मोहब्बतवहां के स्थानीय लोग भी इस परिवार के मुरीद हैं. एक स्थानीय नागरिक बताते हैं कि, “मैं बचपन से इन्हें देखता आ रहा हूं. इनकी पुरानी पीढ़ी भी यही काम करती थी और आज ये भी कर रहे हैं. भगवान की आरती में जो कुपेड़ा काम आता है, वह यहीं बनता है.” पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन इनके हाथ का हुनर औ दिलों की मोहब्बत कभी नहीं बदली. उस्मान, इब्राहिम और अय्यूब की यह कहानी सिर्फ एक पुश्तैनी पेशे की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारत की आत्मा की गवाही है, जहां आस्थाएं आपस में टकराती नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक बनती हैं. जब एक मुस्लिम कारीगर के हाथ से बना त्रिशूल और कुपेड़ा हिंदू मंदिरों की शोभा बढ़ाता है, तो यह पैगाम देता है कि इंसानियत और भाईचारे से बड़ा कोई मजहब नहीं है.
About the Authorमोनाली पाल
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
और पढ़ेंLocation :
Pali,Pali,Rajasthan
First Published :
September 20, 2026, 19:15 IST



