10 पार्षदों वाली BJP क्यों नहीं खोल पाई अध्यक्ष चुनाव में खाता? मुंडवा में RLP-कांग्रेस ने ऐसे बदला पूरा समीकरण

नागौर. राजस्थान नगरीय निकाय चुनाव 2026 के बाद नागौर जिले की मुंडवा नगर पालिका में अध्यक्ष पद का चुनाव बेहद दिलचस्प राजनीतिक समीकरण के साथ सामने आया. 25 वार्डों वाली नगर पालिका में वार्ड पार्षदों के चुनाव में भाजपा सबसे ज्यादा 10 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई थी. इसके अलावा RLP के 7, कांग्रेस के 3 और 5 निर्दलीय पार्षद चुनाव जीते थे. लेकिन अध्यक्ष पद के चुनाव में यही संख्या बल पूरी तरह उलट तस्वीर में बदल गया. भाजपा ने अध्यक्ष पद के लिए गीता देवी को प्रत्याशी बनाया, लेकिन उन्हें एक भी वोट नहीं मिला.
यानी 10 पार्षदों वाली भाजपा के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी का खाता तक नहीं खुल सका. दूसरी तरफ कांग्रेस और RLP ने मिलकर अलका देवी कंदोई को समर्थन दिया. दोनों दलों के पास कुल 10 पार्षद थे, लेकिन अलका कंदोई को 13 वोट मिले. उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी घनश्याम सादावत उर्फ विक्की को एक वोट से हराकर अध्यक्ष पद पर कब्जा कर लिया. विक्की सादावत को 12 वोट मिले. ऐसे में मुंडवा का अध्यक्ष चुनाव केवल एक वोट के अंतर की जीत के कारण ही नहीं, बल्कि भाजपा के 10 पार्षद होने के बावजूद उसके प्रत्याशी को शून्य वोट मिलने के कारण भी चर्चा में है.
अध्यक्ष पद पर हुआ बड़ा उलटफेर
मुंडवा नगर पालिका के 25 वार्डों के चुनाव परिणाम में भाजपा ने 10 सीटों पर जीत दर्ज की थी. RLP के 7, कांग्रेस के 3 और निर्दलीय 5 पार्षद निर्वाचित हुए थे. इस लिहाज से भाजपा के पास अध्यक्ष बनाने के लिए सबसे ज्यादा संख्या बल था. हालांकि अध्यक्ष पद के चुनाव में पार्षदों के मतदान ने अलग ही राजनीतिक तस्वीर सामने रख दी. भाजपा ने गीता देवी को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी बनाया, लेकिन उन्हें एक भी वोट नहीं मिला. उपलब्ध चुनाव परिणाम के अनुसार भाजपा के 10 निर्वाचित पार्षदों में से किसी का वोट गीता देवी के खाते में नहीं गया. यही घटनाक्रम मुंडवा के अध्यक्ष चुनाव का सबसे बड़ा चर्चा का विषय बन गया.
कांग्रेस-RLP के 10 वोट, अलका को मिले 13
अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस और RLP ने साथ आकर अलका देवी कंदोई को समर्थन दिया. दोनों दलों के पास मिलाकर 10 पार्षद थे. इसके बावजूद अलका कंदोई को कुल 13 वोट मिले. यानी उनके पक्ष में कांग्रेस और RLP के 10 पार्षदों के अलावा तीन अन्य वोट भी गए. अलका कंदोई के 13 वोट के मुकाबले निर्दलीय प्रत्याशी घनश्याम सादावत उर्फ विक्की को 12 वोट मिले. इस तरह दोनों के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहा और अलका कंदोई ने महज एक वोट के अंतर से अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की.
विक्की सादावत 12 वोट लेकर चूके
मुंडवा अध्यक्ष चुनाव में घनश्याम सादावत उर्फ विक्की भी मजबूत स्थिति में नजर आए. उन्हें 12 वोट मिले और वह अध्यक्ष बनने से सिर्फ एक वोट दूर रह गए. स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार सादावत भाजपा के टिकट पर पार्षद का चुनाव जीत चुके थे. इसके अलावा वह राजस्थान भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. ज्योति मिर्धा के निजी सलाहकार के तौर पर भी राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे हैं. बताया गया कि अध्यक्ष पद के लिए भाजपा ने गीता देवी को प्रत्याशी बनाया था, जबकि विक्की सादावत को पार्टी की ओर से टिकट नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने अध्यक्ष पद के लिए निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया. परिणाम में उन्हें 12 वोट मिले, जिससे अध्यक्ष चुनाव में उनका मुकाबला निर्णायक स्थिति तक पहुंच गया.
BJP के 10 पार्षद, फिर भी प्रत्याशी को मिला शून्य
मुंडवा के अध्यक्ष चुनाव में सबसे बड़ा सवाल भाजपा के 10 पार्षदों को लेकर खड़ा हुआ है. वार्ड चुनाव में 10 सीटें जीतने के बावजूद पार्टी की अध्यक्ष पद की प्रत्याशी गीता देवी को एक भी वोट नहीं मिला. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस और RLP के पास कुल 10 पार्षद होने के बावजूद अलका कंदोई के खाते में 13 वोट पहुंचे. इस नतीजे ने मुंडवा की स्थानीय राजनीति में पार्षदों के अलग-अलग समीकरण और अध्यक्ष चुनाव में संख्या बल के बदलते गणित को सामने ला दिया है. हालांकि उपलब्ध इनपुट में भाजपा के पार्षदों के मतदान के बारे में कोई अलग कारण या आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है.
एक वोट से बदली मुंडवा की सत्ता
अध्यक्ष चुनाव का अंतिम परिणाम अलका देवी कंदोई के पक्ष में 13 और घनश्याम सादावत के पक्ष में 12 वोट रहा. यानी सिर्फ एक वोट ने मुंडवा नगर पालिका के अध्यक्ष पद का फैसला कर दिया. खास बात यह रही कि सबसे ज्यादा 10 पार्षद जीतने वाली भाजपा अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं जीत सकी और उसके प्रत्याशी को शून्य वोट मिला. वहीं कांग्रेस और RLP के 10 पार्षदों के साथ अलका कंदोई को तीन अतिरिक्त वोट मिले. दूसरी ओर 12 वोट हासिल करने वाले विक्की सादावत भी जीत के बेहद करीब पहुंचकर एक वोट से पीछे रह गए. इस पूरे घटनाक्रम ने मुंडवा में वार्ड चुनाव के बाद बने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.



