मशीनों और ब्रांडेड सामान के बीच जिंदा है पाली का पुश्तैनी हुनर, सुई-धागे से मखमली गद्दे तैयार करते हैं कारीगर

Last Updated:October 04, 2026, 14:33 IST
Pali Hindi News: पाली में पिंजारा समाज आज भी सुई-धागे की मदद से हाथों से मखमली गद्दे तैयार करने की पारंपरिक कला को जिंदा रखे हुए है. बदलते दौर में ब्रांडेड और मशीन से बने उत्पादों की बढ़ती मांग के बीच यह पुश्तैनी हुनर धीरे-धीरे चुनौती का सामना कर रहा है. कारीगरों का कहना है कि मेहनत और बारीकी से तैयार होने वाली इस कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है.
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पाली. सुलगती धुनकी की आवाज, हवा में उड़ती रुई के बारीक कतरे और सुई-धागे से गद्दों पर उकेरते खूबसूरत डिजाइन. यह नजारा है पाली की उन तंग गलियों का, जहाँ आज भी सदियों पुराना एक हुनर सांसें ले रहा है. ब्रांडेड कंपनियों, फोम के गद्दों और रेडीमेड के इस दौर में पाली का पिंजारा समाज आज भी अपनी दशकों पुरानी जंग खाई मशीनों के दम पर हाथों से मखमली और टिकाऊ बिस्तर तैयार कर रहा है. इंदौर से आकर पाली में बसे इन कारीगरों के हाथों की बुनाई के आगे आज भी बड़ी-बड़ी कंपनियाँ फीकी नजर आती हैं. लेकिन इस पारंपरिक मिठास के बीच एक कड़वा सच यह भी है कि अत्यधिक मेहनत और बदलती लाइफस्टाइल के कारण शायद हमारी अगली पीढ़ी इस विरासत को संभाल न पाए. आइए, आपको ले चलते हैं पाली के पिंजारा समाज के बीच और दिखाते हैं लुप्त होती इस नायाब कला की एक अनदेखी तस्वीर….
आधुनिकता की चकाचौंध और रेडीमेड सामानों के बढ़ते बाजार ने भले ही इंसानी जिंदगी को आसान बना दिया हो, लेकिन इस दौर में कई पारंपरिक हुनर धीरे-धीरे ओझल होते जा रहे हैं. इसके बावजूद, पाली शहर में एक ऐसा समाज है जो आज भी तकनीक और मशीनी क्रांति को चुनौती देते हुए अपनी पुरानी परंपरा को सीने से लगाए हुए है. हम बात कर रहे हैं पाली के पिंजारा समाज की, जिनकी पहचान ही रुई की धुनाई और हाथों से मजबूत व मखमली गद्दे बनाने के लिए होती है.
इंदौर से शुरू हुआ सफर, पाली बनी कर्मभूमिबताया जाता है कि वर्षों पहले इंदौर से आए कुछ परिवारों ने पाली में आकर इस काम की शुरुआत की थी. देखते ही देखते पिंजारा समाज की यह पारंपरिक कला पाली शहर की एक विशिष्ट पहचान बन गई. आज भी जब लोग टिकाऊ, आरामदायक और गुणवत्तापूर्ण बिस्तरों की बात करते हैं, तो उनकी पहली पसंद पिंजारा समाज के हाथ से बने गद्दे ही होते हैं.
जंग खाई मशीनें और सुई-धागे का कमालआज के डिजिटल और आधुनिक ज़माने में जहाँ बड़ी-बड़ी कंपनियाँ ऑटोमेटिक मशीनों से गद्दे बना रही हैं, वहीं पिंजारा समाज के कारीगर आज भी अपनी दशकों पुरानी, जंग खाई मशीनों के सहारे काम कर रहे हैं. इन मशीनों से रुई को बारीक-बारीक पिंजकर (धुनकर) रुई की परतें तैयार की जाती हैं. इसके बाद शुरू होता है असली कारीगरी का काम—सुई और मजबूत धागे की मदद से हाथों-हाथ गद्दों और तकियों पर बारीक और खूबसूरत डिजाइन उकेरे जाते हैं. इन बिस्तरों की मखमली मुलायमित और मजबूती ऐसी होती है कि सालों-साल तक इनका कुछ नहीं बिगड़ता.
“आगे की पीढ़ी नहीं करेगी इतनी मेहनत”समय के चक्र ने इस काम के मायने भी बदल दिए हैं. समाज के बुजुर्गों और कारीगरों का दर्द छलकता है कि बदलती प्राथमिकताओं के कारण अब पहले जैसा बाजार नहीं रहा. सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि यह हुनर इसी पीढ़ी तक सीमित रह सकता है. कड़ी शारीरिक मेहनत, रुई के बीच दिन-रात काम करना और उस अनुपात में सीमित मुनाफा होने के कारण नई पीढ़ी इस काम से दूरी बना रही है. कारीगरों का मानना है कि जो पुरानी मशीनें और जो हाथों का जादू आज जिंदा है, आने वाले समय में वह शायद इतिहास के पन्नों में ही दर्ज होकर रह जाएगा. इसके बावजूद, जब तक यह हुनर जिंदा है, पाली का पिंजारा समाज हर सुई-धागे के टांके के साथ अपनी विरासत को मजबूती से सहेजे हुए है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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October 04, 2026, 14:33 IST



