सामान्य दीये से 4 गुना बड़ा, 24 घंटे तक जल सकती है ज्योत, करौली के इस दीपक की खासियत जानें

करौली. दिवाली पर घरों को रोशन करने के लिए बाजारों में एक से बढ़कर एक दीपक बिकते हैं. कहीं रंग-बिरंगे दीये लोगों को आकर्षित करते हैं, तो कहीं बिजली से जगमगाने वाली झालरें और इलेक्ट्रॉनिक दीपक बाजार की रौनक बढ़ाते हैं. लेकिन राजस्थान के करौली में आज भी एक ऐसा पारंपरिक मिट्टी का दीपक है, जिसके आगे आधुनिक सजावटी दीपकों की चमक फीकी पड़ जाती है. इसकी खासियत केवल इसका बड़ा आकार ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी सैकड़ों साल पुरानी परंपरा और मां लक्ष्मी की पूजा में इसका विशेष महत्व भी है.
धर्मनगरी करौली में दिवाली के मौके पर मिट्टी के सामान्य दीपक खरीदने वाले लोग भले ही अपनी जरूरत के हिसाब से दीये खरीदें, लेकिन मां लक्ष्मी के पूजन के लिए इस खास दीपक को खरीदना नहीं भूलते. स्थानीय मान्यता के अनुसार इस दीपक में घी की ज्योत जलाए बिना लक्ष्मी पूजन अधूरा माना जाता है. यही वजह है कि आधुनिकता के इस दौर में भी करौली के कुंभकार परिवारों द्वारा हाथों से तैयार किए जाने वाले इस दीपक की परंपरा कायम है.
सामान्य दीये से चार गुना बड़ा होता है यह दीपक
करौली के बाजारों में मिलने वाला यह विशेष दीपक आकार में सामान्य मिट्टी के दीये से लगभग चार गुना बड़ा होता है. इसे स्थानीय कुंभकार परिवार शुद्ध मिट्टी से तैयार करते हैं. इसकी बनावट ऐसी रखी जाती है कि इसमें पर्याप्त मात्रा में घी डालकर लंबे समय तक ज्योत जलाई जा सके. इस दीपक की सबसे बड़ी खासियत इसका लंबे समय तक जलना है. स्थानीय कुंभकार परिवारों के मुताबिक, इसमें पर्याप्त घी होने और समय-समय पर ध्यान देने पर ज्योत 24 घंटे तक जल सकती है. विशेष परिस्थितियों में देखभाल के साथ यह ज्योत तीन दिन तक भी जल सकती है. हालांकि, इसका वास्तविक समय घी की मात्रा और दीपक के उपयोग पर निर्भर करता है.
मां लक्ष्मी के सामने रातभर जलती है ज्योत
करौली में इस दीपक को खासतौर पर दिवाली की रात मां लक्ष्मी के पूजन के लिए तैयार किया जाता है. मान्यता है कि लक्ष्मी पूजन के दौरान माता के सामने रातभर ज्योत जलती रहनी चाहिए. इसी परंपरा को निभाने के लिए लोग सामान्य दीयों के साथ इस बड़े दीपक को भी खरीदते हैं. इसे बनाने वाली बुजुर्ग महिला धन्नो देवी बताती हैं कि करौली में इस दीपक का विशेष धार्मिक महत्व है. दिवाली पर घरों में मां लक्ष्मी की पूजा के समय इसे घी से जलाया जाता है. स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस दीपक की ज्योत से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है.
पीढ़ियों से मिट्टी को आकार देकर निभा रहे परंपरा
इस खास दीपक के पीछे कुंभकार परिवारों की मेहनत और पारंपरिक हुनर भी छिपा है. मिट्टी को तैयार करने से लेकर उसे मनचाहा आकार देने तक, इस काम में विशेष सावधानी बरती जाती है. कुंभकार परिवारों का कहना है कि इस दीपक की मांग दिवाली के दौरान काफी बढ़ जाती है. कई बार मांग के अनुरूप दीपक तैयार करना भी मुश्किल हो जाता है. इसकी वजह यह है कि इसे सामान्य दीयों की तरह नहीं, बल्कि विशेष आकार और उपयोग को ध्यान में रखकर बनाया जाता है.
शगुन के तौर पर खरीदा जाता है केवल एक दीपक
इस दीपक से जुड़ी एक और खास परंपरा है. करौली में इसे शगुन के तौर पर एक ही खरीदा जाता है. लोग दिवाली की सजावट के लिए भले ही दर्जनों या सैकड़ों सामान्य दीपक खरीद लें, लेकिन मां लक्ष्मी के पूजन के लिए इस बड़े दीपक को विशेष रूप से घर लाते हैं. इसकी कीमत भी आम लोगों की पहुंच में है. बाजार में यह खास दीपक करीब 20 से 30 रुपये में मिल जाता है. कम कीमत होने के बावजूद इसका धार्मिक और पारंपरिक महत्व बहुत अधिक है.



