दीवारों पर जड़ा 3.5 किलो सोना, 250 साल बाद भी कायम है राजस्थान की इस हवेली का वैभव

Jhunjhunu: राजस्थान का शेखावाटी अंचल अपनी अद्भुत वास्तुकला, बारीक नक्काशी और मनमोहक भित्ति चित्रों (Fresco Paintings) के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है. इसी क्षेत्र के झुंझुनूं जिले में स्थित मंडावा कस्बे की एक हवेली कला और समृद्धि की एक अनोखी मिसाल पेश करती है. लगभग 250 वर्ष पुरानी इस ऐतिहासिक ‘लड़िया हवेली’ की बैठक की दीवारों पर सोने की चमक आज भी देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है.
इस प्रसिद्ध हवेली की भव्य बैठक में सोने के घोल का उपयोग करके देवी-देवताओं के अत्यंत सुंदर और बारीक चित्र उकेरे गए हैं. भगवान श्री राम का दरबार, रिद्धि-सिद्धि दाता श्री गणेश, धन-धान्य की देवी मां लक्ष्मी और ज्ञान की देवी मां सरस्वती के ये दिव्य चित्र न केवल उस दौर के कारीगरों की श्रेष्ठ कलात्मकता को दर्शाते हैं, बल्कि शेखावाटी के प्रसिद्ध सेठों की अपार समृद्धि और वैभव की कहानी भी बयां करते हैं.
सेठ केदारमल लड़िया ने करवाया था निर्माण‘गोल्डन पेंटिंग हवेली’ (Golden Painting Haveli) के नाम से देश और दुनिया में खास पहचान रखने वाली इस भव्य इमारत का निर्माण सेठ केदारमल लड़िया ने संवत 1840 में करवाया था. हवेली की इस विशेष बैठक को खासतौर पर दूर-दराज से आने वाले विशिष्ट मेहमानों और व्यापारियों के ठहरने व उनके आदर-सत्कार के लिए तैयार कराया गया था. लगभग 15 फीट चौड़ी और 16 फीट लंबी इस ऐतिहासिक बैठक की चारों दीवारों पर बेहद बारीकी से शुद्ध सोने के घोल का उपयोग कर सुंदर चित्रकारी करवाई गई थी. स्थानीय इतिहासकारों और पुरानी मान्यताओं के अनुसार, बैठक की चारों दीवारों पर इन दिव्य और भव्य चित्रों को तैयार करने में लगभग साढ़े तीन किलो सोने का इस्तेमाल किया गया था.
6 वर्षों की कड़ी मेहनत से तैयार हुए भित्ति चित्रइस हवेली की बैठक की दीवारों पर रंगों और चित्रकारी का ऐसा अद्भुत व दुर्लभ तालमेल देखने को मिलता है, जो इसे शेखावाटी की अन्य तमाम हवेलियों से बिल्कुल अलग पहचान दिलाता है. प्राकृतिक लाल, पीले, हरे और नीले रंगों के भव्य संयोजन के बीच देवी-देवताओं के मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं. इन चित्रों की सुंदरता और आकर्षण को कई गुना बढ़ाने के लिए जगह-जगह बहुमूल्य रत्नों जैसे चमकने वाले विशेष शीशों और काँच का उपयोग भी किया गया था. बताया जाता है कि उस दौर के स्थानीय कुशल चित्रकार को इस अत्यंत बारीक, धैर्यपूर्ण और कठिन कलाकृति को पूरा करने में लगभग छह वर्ष का लंबा समय लगा था. उस दौर में हवेलियों का निर्माण केवल निवास के लिए नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, वैभव और कलात्मक अभिरुचि को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता था.
सोने के बर्तन और बहुमूल्य रत्नों के शौकीन थे सेठहवेली के संस्थापक सेठ केदारमल लड़िया के बारे में प्रसिद्ध है कि उन्हें सोने, चांदी और बहुमूल्य रत्नों से गहरा लगाव था. उनके बारे में यह किस्सा आज भी मशहूर है कि वे स्वयं प्रतिदिन सोने की थाली में भोजन करते थे और हवेली में आने वाले मेहमानों को भी सोने के बर्तनों में ही भोजन परोसकर उनका सत्कार करते थे. सोने के प्रति उनके इसी अनोखे प्रेम और शौक के कारण उन्होंने हवेली की मुख्य बैठक की दीवारों को भी सोने की चित्रकारी से सजाने का फैसला किया था. सदियों का समय बीत जाने और मौसम के थपेड़े सहने के बाद भी ये चित्र आज भी हवेली के मुख्य आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं.
शेखावाटी के व्यापारिक और सांस्कृतिक वैभव की निशानीमंडावा की यह ‘गोल्डन पेंटिंग हवेली’ केवल एक प्राचीन इमारत नहीं है, बल्कि यह शेखावाटी के समृद्ध व्यापारिक इतिहास, वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत का एक अमूल्य हिस्सा है. इस क्षेत्र के कई महान कारोबारी परिवारों ने देश की अर्थव्यवस्था और आधुनिक उद्योग जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ी है. बिड़ला, खेतान, डालमिया, सिंघानिया, पोद्दार, माहेश्वरी, पीरामल, केडिया, टीबड़ा, रूंगटा, गोयनका और सोंथलिया जैसे देश के शीर्ष उद्योग घरानों का नाता इसी अंचल की समृद्ध कारोबारी परंपरा से जुड़ा हुआ है. मंडावा की यह स्वर्णिम हवेली हमें उस स्वर्णिम दौर की याद दिलाती है, जब कला को सहेजने के लिए धन-दौलत के साथ-साथ हुनर और समय की बाजी लगाई जाती थी.



