अलवर की देशी बकरी नस्लों को मिलेगी नई पहचान, ‘बतीसी’ बकरी बनी संभावित नई स्वदेशी नस्ल!

अलवर. जिले की देशी पशुधन संपदा को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर), करनाल की वैज्ञानिक टीम ने अलवर जिले में व्यापक सर्वेक्षण कर स्वदेशी बकरी की एक नई संभावित नस्ल की पहचान की है. इस नई आबादी को स्थानीय स्तर पर “बतीसी” के नाम से जाना जाता है, जिसे भविष्य में स्वदेशी बकरी नस्ल के रूप में मान्यता मिल सकती है. एनबीएजीआर की टीम ने कई दिनों तक अलवर जिले के विभिन्न ब्लॉकों और गांवों में जाकर बकरियों की शारीरिक बनावट, उत्पादन क्षमता, प्रजनन क्षमता और स्थानीय अनुकूलन का अध्ययन किया.
प्रारंभिक सर्वेक्षण में वैज्ञानिकों ने पाया कि “बतीसी” बकरियां स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं. परियोजना के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रधान अन्वेषक डॉ. दिनेश कुमार यादव ने बताया कि ब्यूरो द्वारा राज्य में स्वदेशी पशुधन एवं मुर्गी नस्लों का दस्तावेजीकरण करने के उद्देश्य से यह सर्वेक्षण किया. अलवर जिले में पाई गई “बतीसी” बकरी आबादी को आगे विस्तार से अध्ययन कर स्वदेशी नस्ल के रूप में मान्यता दी जा सकती है. उन्होंने यह भी बताया कि ये बकरियां दोहरे उद्देश्य वाली हैं, जो दूध उत्पादन के साथ-साथ बिक्री के माध्यम से पशुपालकों को अच्छा आर्थिक संबल प्रदान करती हैं.
विशिष्ट शारीरिक बनावट से होती है “बतीसी” बकरियों की पहचान
ये सामान्यतः सफेद रंग की होती हैं, जिनके पेट पर काले रंग का अंगूठी जैसा निशान होता है, इसके अलावा चेहरे और गर्दन पर भी काले धब्बे पाए जाते हैं. इनका शरीर लंबा लेकिन पतला होता है, दूध उत्पादन की दृष्टि से ये बकरियां लगभग 3 से 4 महीनों तक प्रतिदिन 1 से 2 लीटर दूध देने में सक्षम हैं. साथ ही, ये प्रजनन क्षमता में भी बेहतर मानी जाती हैं और नियमित रूप से जुड़वा बच्चों को जन्म देती हैं. एनबीएजीआर के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एस. के. निरंजन ने बताया कि वर्तमान में राजस्थान में 34 पशुधन एवं मुर्गी की पंजीकृत नस्लें हैं, जो देश में सर्वाधिक हैं. इसके बावजूद राज्य में अभी भी कई स्वदेशी पशु आबादियां ऐसी हैं, जिनकी पहचान और पंजीकरण किया जाना बाकी है.
पशुपालन विभाग अलवर के संयुक्त संचालक डॉ. रमेश चंद मीणा ने बताया कि विभाग द्वारा इस वर्ष नस्लवार पशुधन गणना सफलतापूर्वक पूरी की गई है. उन्होंने कहा कि जिले में पशुधन का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अवर्गीकृत है, जिसकी पहचान आवश्यक है. इस प्रकार के सर्वेक्षण से देशी पशुओं की पहचान सुनिश्चित होगी और अवर्गीकृत पशुओं की संख्या कम करने में मदद मिलेगी.
टीम ने जिले में निराश्रित मवेशियों की स्थिति का भी किया अध्ययन
सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिक टीम ने मालाखेड़ा, रैणी, उमरेण, रामगढ़ और धानागाजी ब्लॉक के विभिन्न गांवों का दौरा किया. इस पूरे दौरे का समन्वय अलवर पशुपालन विभाग के वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. प्रदीप सिंह द्वारा किया. इसके साथ ही टीम ने जिले में निराश्रित मवेशियों की स्थिति का भी अध्ययन किया. निराश्रित पशुओं के कारणों की पहचान कर उनके प्रबंधन हेतु नीति एवं सुझाव तैयार करने पर चर्चा की गई.
वैज्ञानिकों ने विभिन्न गौशालाओं का निरीक्षण किया और ग्रामीणों व किसानों से संवाद कर उनकी समस्याओं और सुझावों को जाना. इस विषय पर अलवर नगर निगम आयुक्त एवं पशुपालन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी विस्तृत चर्चा की गई. यह सर्वेक्षण अलवर जिले की देशी पशुधन संपदा के संरक्षण और विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है.



