बहरूपिया कला! परंपराओं की विरासत को बचाने की कोशिश, विलुप्ति के कगार पर संघर्षरत कलाकार

उदयपुर : बदलते युग में मनोरंजन के साधनों की विविधता ने पारंपरिक कलाओं को पीछे छोड़ दिया है . ऐसी ही एक कला है बहरूपिया कला, जो कभी राजा-महाराजाओं के मनोरंजन का प्रमुख साधन हुआ करती थी.आज यह कला विलुप्ति की कगार पर है. हालांकि, कुछ परिवार आज भी इसे जिंदा रखने का प्रयास कर रहे हैं. राजस्थान के बांदीकुई से आए बहरूपिया कलाकार शमशाद बताते हैं कि उनके परिवार में अब गिने-चुने लोग ही इस परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं.मेलों और स्थानीय उत्सवों में अपनी प्रस्तुतियों के जरिए वे लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं. इस कला में कलाकार अलग-अलग रूप धारण कर अपनी प्रस्तुति देते हैं.पारंपरिक पात्रों जैसे अलादीन का जिन, विक्रम-बेताल के साथ-साथ आधुनिक समय के पात्र जैसे मोटू-पतलू और ओगी जैसे कैरेक्टर्स को अपनाकर वे नई पीढ़ी से जुड़ने की कोशिश कर रहे है.
संघर्ष और पहचान की कोशिशशमशाद बहरूपिया बताते हैं कि यह कला न केवल मनोरंजन है, बल्कि समाज को विभिन्न संदेश देने का माध्यम भी है. लेकिन आज के समय में परिवार के सदस्य इस कला से मुंह मोड़ रहे हैं, क्योंकि इससे मिलने वाली आय पर्याप्त नहीं है. इसके बावजूद, वे इसे जीवित रखने के लिए अपने प्रयास जारी रखे हुए हैं.
साज-संरक्षण की आवश्यकताबहरूपिया कला को आज भी उन लोगों का प्यार मिलता है, जो पारंपरिक कला रूपों को महत्व देते हैं. हालांकि, इस कला को संरक्षित करने और इसे बढ़ावा देने के लिए सरकार और समाज का सहयोग जरूरी है.शमशाद जैसे कलाकारों की मेहनत के बावजूद, यह कला साज-संरक्षण के अभाव में विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही है.
नए पात्रों को अपनाकर और आधुनिक समाज की जरूरतों के अनुसार अपने प्रदर्शन में बदलाव करके, बहरूपिया कलाकार अपनी कला को प्रासंगिक बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं.लेकिन इसे आर्थिक और सामाजिक समर्थन की जरूरत है. यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो यह कला केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएगी.आवश्यकता है कि समाज इस अद्वितीय कला रूप को प्रोत्साहन दे और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने में योगदान करे.
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FIRST PUBLISHED : January 1, 2025, 14:11 IST