Entertainment

‘गोलमाल’ के भवानी शंकर, सिर्फ हंसाया ही नहीं, नाटकों से सत्ता की नींव भी हिलाई

नई दिल्ली: उत्पल दत्त आज भी अपने किरदारों से हंसाते-गुदगुदाते हैं. एक्टर की खासियत यह थी कि वह अभिनय को सिर्फ डायलॉग बोलने या किरदार निभाने तक सीमित नहीं मानते थे. उनके लिए रंगमंच समाज से बातचीत करने का एक मजबूत माध्यम था. उन्होंने कई ऐसे नाटक किए जिनमें राजनीति, सामाजिक असमानता, शोषण और सत्ता के रवैये पर सवाल उठाए गए. उनके नाटकों में मनोरंजन जरूर था, लेकिन उसके पीछे एक गंभीर संदेश भी छिपा होता था.

उत्पल दत्त का जन्म 29 मार्च 1929 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के बरिसाल में हुआ था. बचपन से ही उन्हें साहित्य, रंगमंच और अभिनय में गहरी दिलचस्पी थी. धीरे-धीरे यही रुचि उनके जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा बन गई. उन्होंने अंग्रेजी रंगमंच से अपने अभिनय सफर की शुरुआत की और आगे चलकर बंगाली रंगमंच के बड़े नामों में शामिल हो गए.

यही वजह थी कि उत्पल दत्त को सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक रंगकर्मी और विचारशील कलाकार के रूप में भी पहचाना गया. वह अपने विचारों को खुलकर रखने के लिए जाने जाते थे. उनका मानना था कि कलाकार का काम केवल दर्शकों का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने आसपास की दुनिया के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करना भी है. रंगमंच के साथ-साथ फिल्मों में भी उत्पल दत्त ने अपनी अलग पहचान बनाई. खासकर हिंदी फिल्मों में उन्होंने ऐसे किरदार निभाए, जिन्हें दर्शक आज भी याद करते हैं. उनकी आवाज, चेहरे के भाव और संवाद बोलने का अंदाज उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाता था.

किरदार में ढल जाते थे उत्पल दत्तउत्पल दत्त की कॉमेडी की बात करें तो उन्होंने पर्दे पर ऐसा हास्य पेश किया, जिसमें सिर्फ हंसी नहीं थी बल्कि किरदार की अपनी एक अलग दुनिया होती थी. कभी वह सख्त पिता बने, कभी परेशान अधिकारी, कभी चालाक व्यक्ति तो कभी ऐसा किरदार जिसकी हरकतें दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर देती थीं. उनका अभिनय इतना सहज लगता था कि कई बार दर्शक भूल जाते थे कि वे एक कलाकार को देख रहे हैं.

याद रह गया ‘गोलमाल’ का भवानी शंकरऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में उत्पल दत्त के कई किरदार खास तौर पर याद किए जाते हैं. ‘गोलमाल’ में भवानी शंकर का उनका किरदार आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय कॉमेडी भूमिकाओं में गिना जाता है. बड़ी-बड़ी मूंछें, सख्त अंदाज, संस्कारों को लेकर उनके अजीबोगरीब नियम और सामने वाले पर लगातार रौब जमाने का तरीका- इस किरदार ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया.

नाटकों की वजह से मुश्किल से भी घिरेउत्पल दत्त का रंगमंच राजनीतिक चेतना से काफी प्रभावित था. उन्होंने सत्ता, व्यवस्था और सामाजिक अन्याय को लेकर अपनी बात नाटकों के जरिए कही. उनके नाटक कई बार सीधे राजनीतिक सवालों से टकराते थे. यही कारण था कि उनका रंगकर्म सिर्फ कला की दुनिया तक सीमित नहीं रहा बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बना. उत्पल दत्त का सफर आसान नहीं था. अपने विचारों और राजनीतिक नाटकों के कारण उन्हें विरोध और मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा. उन्होंने अपने विचारों से समझौता करने के बजाय अपने रंगमंच को और ज्यादा धार दी. उनके लिए मंच सिर्फ रोशनी, पर्दे और संवादों की जगह नहीं था बल्कि वह समाज का आईना था.

दर्शकों के बीच बड़ी पहचानउत्पल दत्त की अभिनय प्रतिभा को नेशनल लेवल पर भी सम्मान मिला. उन्हें ‘गोलमाल’ के लिए बेस्ट कॉमेडी एक्टर का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला और बाद में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया. हालांकि पुरस्कारों से कहीं ज्यादा बड़ी उनकी पहचान दर्शकों के बीच बनी रही. 9 अगस्त 1993 को उत्पल दत्त का निधन हो गया, लेकिन उनके अभिनय और रंगमंच की विरासत आज भी जिंदा है. उनकी फिल्मों के किरदार आज भी लोगों को हंसाते हैं और उनके नाटक आज भी रंगमंच की दुनिया में चर्चा का विषय हैं.

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj