बर्फ का सौदा या विनाश को न्योता? डेथ ट्रैप ना बन जाए ग्रीनलैंड पर ट्रंप की जिद, एक गलती और फंस जाएगा अमेरिका

Last Updated:January 06, 2026, 19:35 IST
Greenland Controversy: ग्रीनलैंड को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की जिद नाटो (NATO) के लिए डेथ वारंट साबित हो सकती है. यदि अमेरिका डेनमार्क की संप्रभुता पर चोट करता है तो सामूहिक सुरक्षा का अनुच्छेद 5 बेअसर हो जाएगा. इससे यूरोप का भरोसा टूटेगा और रूस-चीन को आर्कटिक में दबदबा बनाने का सीधा मौका मिलेगा. यह रणनीतिक दांव अमेरिका को अपने ही वफादार सहयोगियों के बीच पूरी तरह अलग-थलग और असुरक्षित कर देगा.
ग्रीनलैंड पर ट्रंप दावा ठोक रहे हैं. (AI Image)
ट्रंप ग्रीनलैंड विवाद: दुनिया के नक्शे पर सफेद चादर ओढ़े ग्रीनलैंड को खरीदने या हथियाने की डोनाल्ड ट्रंप की जिद अब सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति का बारूद बन चुकी है. ट्रंप बार-बार नाटो (NATO) के सहयोगियों को दबाने और ग्रीनलैंड को अमेरिकी साम्राज्य का हिस्सा बनाने की हुंकार भर रहे हैं. लेकिन बर्फ के नीचे दबे खनिजों की यह भूख अमेरिका के लिए एक ऐसा डिप्लोमैटिक डेथ ट्रैप साबित हो सकती है जो दशकों पुराने सैन्य गठबंधन की जड़ों को हिला देगा. डेनमार्क बार-बार ट्रंप से अनुरोध कर रहा है कि वो ग्रीनलैंड हथियाने की जिद्द छोड़ दे. अगर वाशिंगटन ने डेनमार्क की संप्रभुता पर चोट की तो नाटो के भीतर एक ऐसा गृहयुद्ध छिड़ेगा जिससे रूस और चीन को आर्कटिक में खुली एंट्री मिल जाएगी. यह दांव उलटा पड़ा तो अमेरिका न केवल अपने सबसे वफादार यूरोपीय दोस्तों को खो देगा बल्कि वैश्विक सुरक्षा के मंच पर पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाएगा.
1. नाटो के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थितिडेनमार्क नाटो का एक संस्थापक और बेहद वफादार सदस्य है. अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश करता है, तो यह इतिहास में पहली बार होगा जब नाटो का सबसे शक्तिशाली सदस्य अपने ही एक सहयोगी की संप्रभुता पर हमला करेगा. इससे नाटो के अनुच्छेद 5 (Article 5) की प्रासंगिकता खत्म हो जाएगी, जो सामूहिक सुरक्षा की गारंटी देता है. यूरोप के अन्य देश (जैसे फ्रांस और जर्मनी) अमेरिका को एक रक्षक के बजाय एक ‘खतरा’ मानने लगेंगे.
2. यूरोपीय देशों का अमेरिका से मोहभंगयूरोपीय देश पहले से ही अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करने की बात कर रहे हैं. ग्रीनलैंड मुद्दे पर विवाद होने से यूरोपीय संघ (EU) अपनी अलग यूरोपीय सेना बनाने की प्रक्रिया तेज कर देगा. इससे नाटो कमजोर होगा और यूरोप में अमेरिका का दशकों पुराना दबदबा हमेशा के लिए खत्म हो सकता है.
3. रूस और चीन को खुला निमंत्रणनाटो के भीतर फूट पड़ते ही रूस और चीन इसका फायदा उठाएंगे. अगर नाटो देश आपस में ही उलझ गए, तो आर्कटिक क्षेत्र में रूस की सैन्य ताकत को चुनौती देने वाला कोई नहीं बचेगा. रूस यह तर्क दे सकता है कि जब अमेरिका जमीन हड़प सकता है, तो वह भी यूक्रेन या बाल्टिक देशों में ऐसा ही कर सकता है. इससे पूरा अंतरराष्ट्रीय कानून ही ध्वस्त हो जाएगा.
4. आर्कटिक काउंसिल में अराजकताआर्कटिक परिषद में नाटो के कई सदस्य (कनाडा, नॉर्वे, आइसलैंड) शामिल हैं. ग्रीनलैंड पर अमेरिका के दावे से इन देशों के बीच समुद्री सीमाओं और संसाधनों को लेकर विवाद छिड़ जाएगा. अमेरिका जो सुरक्षा चक्र (Buffer Zone) बनाना चाहता है, वह खुद उसके लिए एक डिप्लोमैटिक ट्रैप बन जाएगा क्योंकि उसके सबसे करीबी पड़ोसी ही उसके दुश्मन बन जाएंगे.
About the AuthorSandeep Gupta
पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें
First Published :
January 06, 2026, 19:35 IST
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