Jaipur Dussehra 2026: रावण बनाने के लिए छोड़ देते हैं प्याज-लहसुन, जयपुर के मुस्लिम परिवार की अनोखी परंपरा

जयपुर. नवरात्रि का पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है, दशहरे को लेकर जयपुर की सड़कों और मैदानों में रावण के पुतले नजर आने लगे हैं, लेकिन आदर्श नगर में बनने वाला 120 फीट ऊंचा रावण हर साल लोगों के आकर्षण का केंद्र रहता है. इसकी सबसे खास बात यह है कि इसे मथुरा का एक मुस्लिम परिवार तैयार करता है. यह परिवार पिछले पांच पीढ़ियों से रावण बनाने की परंपरा को निभा रहा है और सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है.
लोकल-18 से बातचीत में रावण बनाने वाले कारीगर चांद बाबू ने बताया कि उनके परिवार ने करीब 60 साल पहले जयपुर में 20 फीट ऊंचा रावण बनाने का काम शुरू किया था. समय के साथ पुतले का आकार और भव्यता बढ़ती गई. इस बार 120 फीट ऊंचा रावण बनाया जा रहा है, इसके साथ कुंभकर्ण का पुतला भी तैयार किया जा रहा है. परिवार दशहरे से करीब दो महीने पहले ही रावण बनाने का काम शुरू कर देता है.
25 सदस्य मिलकर तैयार करते हैं विशाल रावण
चांद बाबू के अनुसार, उनके परिवार के करीब 25 सदस्य मिलकर रावण का पुतला तैयार करते हैं, उनके पिता लखो भाई, जिन्हें लोग ‘रावण वाले भाई’ के नाम से भी जानते हैं, छह साल की उम्र में पहली बार अपने दादा के साथ जयपुर आए थे. उस समय मंदिर प्रन्यास ने दशहरा मेला शुरू किया था. तब 20 फीट ऊंचा रावण बनाने के लिए 250 रुपए मेहनताना और 10 रुपए इनाम मिलता था. इस बार 120 फीट के रावण को तैयार करने के लिए एक लाख रुपए मेहनताना तय हुआ है.
600 बांस और पांच क्विंटल मैदे का इस्तेमाल
इस विशाल रावण को बनाने में 600 बांस, पांच क्विंटल मैदा, तीन क्विंटल खाकी कागज, 200 किलो जेवड़ी, 200 किलो सफेद रद्दी, 150 किलो रस्सी और 35 किलो धागे का इस्तेमाल किया गया है. इस बार रावण के मुकुट और हथियारों पर खास लाइटिंग की गई है, जो दूर से ही लोगों का ध्यान खींचेगी. पुतले को अलग-अलग हिस्सों में तैयार किया जा रहा है, बाद में क्रेन की मदद से इन्हें मैदान में ले जाकर जोड़ा जाएगा.
रावण बनाने के दौरान सात्विक भोजन करता है परिवार
चांद बाबू ने बताया कि पुतला बनाने के दौरान परिवार के सदस्य करीब डेढ़ महीने तक मंदिर परिसर में रहते हैं. इस दौरान वे सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं. परिवार के चूल्हे पर प्याज, लहसुन और नॉनवेज नहीं पकाया जाता. सुबह-शाम मंदिर में आरती होने पर सभी सदस्य हाथ जोड़कर खड़े होते हैं. रामलीला देखते-देखते परिवार की नई पीढ़ी को भी रामायण की चौपाइयां और श्लोक याद हो गए हैं. नवरात्रि के दौरान पूरा परिवार भक्ति के माहौल में रहकर रावण तैयार करता है. दशहरे पर रावण दहन के तीन दिन बाद परिवार वापस मथुरा लौट जाता है. जयपुर में इस परिवार की परंपरा गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की मिसाल बनी हुई है.



