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जालौर की पारंपरिक पखाल न्यूज़

Last Updated:April 22, 2026, 12:39 IST

Traditional Water Cooling Pakhal: जालौर में भीषण गर्मी के बीच पारंपरिक जलपात्र पखाल की वापसी हुई है. मोटे सूती कपड़े से बनी यह पखाल वाष्पीकरण के जरिए मात्र 15 मिनट में पानी को ठंडा कर देती है. 30 साल बाद फिर से चलन में आई यह तकनीक प्लास्टिक मुक्त जीवन और पर्यावरण संरक्षण का बड़ा उदाहरण पेश कर रही है. स्थानीय लोग अब फ्रिज के पानी के बजाय इस देसी शीतल जल को पसंद कर रहे हैं.

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Jalore: राजस्थान के जालौर जिले में जब पारा आसमान छूने लगता है और आधुनिक संसाधन भी गर्मी के आगे घुटने टेक देते हैं, तब यहाँ की एक पुरानी परंपरा पखाल संजीवनी बनकर उभरी है. जिसे लोग भूल चुके थे, वह छागल या दिवड़ी आज एक बार फिर जालौर की गलियों और बाजारों में शान से बिकती नजर आ रही है. यह एक ऐसा देसी जुगाड़ है जो सदियों से मारवाड़ के तपते धोरों में प्यास बुझाता आया है. पुराने समय में जब फ्रिज और बिजली की पहुँच हर घर तक नहीं थी, तब यही पखाल लोगों के लिए चलता-फिरता फ्रिज हुआ करता था. आज की पीढ़ी भी इसके शीतल जल के स्वाद और फायदों की कायल हो रही है.

पखाल या छागल का निर्माण एक विशेष प्रकार के मोटे और मजबूत सूती कपड़े से किया जाता है. इसकी बनावट के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक कारण छिपा है. इसमें भरा पानी मात्र 10 से 15 मिनट के भीतर प्राकृतिक रूप से ठंडा हो जाता है. इसके पीछे वाष्पीकरण की प्रक्रिया काम करती है. कपड़े की सतह पर मौजूद नमी जब बाहर की गर्म हवा के संपर्क में आती है, तो वह भाप बनकर उड़ती है. इस प्रक्रिया के दौरान कपड़े के अंदर मौजूद पानी की गर्मी बाहर निकल जाती है और अंदर का जल पूरी तरह शीतल हो जाता है. यह पूरी तरह से इको-फ्रेंडली तरीका है जिसमें न बिजली की जरूरत होती है और न ही किसी केमिकल की.

तीन दशक बाद फिर लौटा वही पुराना दौरजालौर के स्थानीय दुकानदारों के अनुसार करीब 30 साल पहले तक हर घर और चरवाहे के कंधे पर पखाल दिखाई देता था. प्लास्टिक और स्टील की बोतलों के आने से यह परंपरा कुछ समय के लिए विलुप्त होने लगी थी. लेकिन अब बढ़ती गर्मी और प्लास्टिक के नुकसानों को देखते हुए लोग फिर से अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं. दुकानदार घेवर वागेरा ने बताया कि लोग अब स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे हैं और प्लास्टिक की बोतलों में गर्म होने वाले पानी के बजाय पखाल को प्राथमिकता दे रहे हैं. बाजार में इसकी बढ़ती मांग इस बात का प्रमाण है कि पुरानी तकनीकें आज भी सबसे कारगर हैं.

पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए वरदानपखाल न केवल पानी को ठंडा रखती है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित है. प्लास्टिक की बोतलों से होने वाले प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरों के मुकाबले यह सूती कपड़े का पात्र बेहद हल्का और टिकाऊ होता है. किसान, मजदूर और यात्रा करने वाले लोग इसे आसानी से अपने साथ ले जा सकते हैं. कम संसाधनों में बेहतर जीवन जीने का यह संदेश आज के आधुनिक समाज के लिए एक बड़ी सीख है. जालौर की यह पखाल हमें याद दिलाती है कि सादगी और पारंपरिक ज्ञान में ही पर्यावरण और इंसानियत का बेहतर भविष्य छिपा है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें

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Location :

Jalor,Jalor,Rajasthan

First Published :

April 22, 2026, 12:39 IST

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