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जब अन्य सरकारी महकमें अछूते नहीं तो यह रोक पुलिस विभाग में ही क्यों ?

पुलिसथानों में सुबह-शाम आरती गाते देखा है तो पांचों समय की नमाज अदा करते भी देखा है। सेवार्थ कटिबद्धता के साथ राजस्थान पुलिस का ध्येय अपराधियों में डर आमजन का विश्वास है। सेवा सुरक्षा सहयोग पुलिस का आदर्श वाक्य है।अब इन सिद्धांतों पर चलने वाली पुलिस को आज से एक आदेश का ओर पालन करना होगा और वह है कि पुलिसथानों में और कार्यालयों में धार्मिक आस्था का कोई प्रतीक नहीं होगा और न ही सुबह-शाम की पूजा और पांचों समय की नमाज पुलिसकर्मी या अधिकारी अदा कर सकेंगे इसे लेकर संशय बरकरार है,क्योंकि प्रदेश में शत प्रतिशत सरकारी भवन इस तरह के पूजा स्थलों से अछूते नहीं हैं।
जैसा आदेश अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (आवासन) द्वारा जारी किए गए है उसके अनुसार पिछले समय से देखने में आया है कि पुलिसथानों और कार्यालयों में जनसहभागिता से आस्था के नाम पर पूजा स्थलों के निर्माण पर रोक लगा दी गई है। राजस्थान धार्मिक भवन एवं स्थल अधिनियम १९५४ के अक्षरत पालन करने के आदेश दिए है।
सर्वधर्म समभाव से सेवार्थ राजस्थान पुलिस भी छत्तीस कौम का एक हिस्सा है और छत्तीसकौम के अपने रीति-रिवाज होते हैं ऐसे में पुलिसथानों में उन्हें आस्था से वंचित किया जाना एक सोचनीय विषय हो सकता है। सार्वजनिक रूप से पुलिसथानों में आरती समरसता का प्रतीक होती है। इस आदेश से अगर वह प्रभावित होती है तो यह आस्था पर कुठाराघात साबित होगा। आगे से जनसहभागिता से आस्था के नाम पर पूजा स्थल का निर्माण न हो यह तो ठीक है लेकिन जो हो रहा है उसे भी आदेश के नाम पर अंकुश लगाना कहा तक न्याय संगत होगा इस पर विचार करना आवश्यक है। क्योंकि कई पुलिसकर्मी ऐसे है जो महिनों अपने घर नहीं जाते है उनके लिए पुलिस थाना में उनका कमरा ही सबकुछ होता है ऐसे में अगर वह आस्था के रूप में पूजा करता है तो क्या गुनाह करता है यह एक विचारणीय पहलू होना चाहिए। आज यह आदेश निकाला गया है राजस्थान धार्मिक भवन एवं स्थल अधिनियम १९५४ का हवाला देते हुए। कल दूसरा आदेश निकाल दे कि पुलिसथानों में पुलिसकर्मी न आरती कर सकेंगे और न ही नमाज अदा कर सकेंगे तो क्या यह वर्तमान परिपेक्ष्य के हिसाब से तर्क संगत होगा। अत: मेरे हिसाब से इस तरह के आदेशों पर एक बार फिर से पुलिस के आलाअधिकारियों को विचार कर लेना चाहिए,क्योंकि जहां तक देखा गया है राजस्थान के शत प्रतिशत सरकारी महकमें आस्था के प्रतीक पूजा स्थलों से अटे पड़े हैं चाहे जिला कलेक्ट्रेट हो या फिर शासन सचिवालय या न्यायालय परिसर हो या अन्य विभाग।

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