Snake Venom To High BP Medicine : इंसानों के लिए वरदान बन गया इस सांप का जहर, विष से निकला हाई BP का रामबाण इलाज, डंक से कैप्सोप्रील तक की कहानी

कहते हैं ‘जहर ही जहर को काटता है’, एक सांप के विष ने ये कहावत सच कर दी. इस जंगली और बेहद जहरीले सांप के डंक से वो वरदान निकला जो आज दुनिया भर में लाखों-करोड़ों इंसानों की जिदंगी बचा रहा है. जिस सांप के काटने से इंसान चंद मिनटों में तड़प-तड़पकर दम तोड़ दे, उसी के खतरनाक जहर से दुनिया की पहली सबसे असरदार हाई ब्लड प्रेशर (BP) की दवा बनाई गई. ये मेडिकल साइंस का एक ऐसा ऐतिहासिक सच है जिसने पूरी दुनिया में कार्डियोवैस्कुलर मेडिसिन की दुनिया बदल दी.
1960 के दशक में ब्राजील के जंगलों में पाए जाने वाले एक बेहद जहरीले सांप पर हुए रिसर्च ने इसी रिसर्च की बदौलत 1981 में अमेरिका में ‘कैप्टोप्रील’ नाम की दवा को मंजूरी मिली, जो हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित हुई.
ब्राजील का वो खूंखार सांप, जिसके जहर से शुरू हुई कहानी
दक्षिण अमेरिका और खासकर ब्राजील के घने जंगलों में एक पिट वाइपर पाया जाता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ब्राजीलियन लान्सहेड या जाराराका कहा जाता है. ये सांप अपनी तेजी और बेहद जहरीले डंक के लिए जाना जाता है. जब ये किसी शिकार को काटता है, तो पीड़ित का ब्लड प्रेशर अचानक बहुत तेजी से गिर जाता है और वह बेहोश होकर गिर पड़ता है.
सालों तक वैज्ञानिक इस बात से हैरान थे कि आखिर इस जहर में ऐसा क्या है जो पलक झपकते ही शरीर के पूरे ब्लड प्रेशर सिस्टम को ठप कर देता है. सदियों से जहां दुनिया भर की प्राचीन संस्कृतियों में प्रकृति को इलाज और सुरक्षा का जरिया माना जाता रहा है, वहीं 1960 के दशक में आधुनिक वैज्ञानिकों ने इस खतरनाक जहर की बायोकेमिस्ट्री को खंगालना शुरू किया.
1965 की वो ऐतिहासिक रिसर्च: एक युवा वैज्ञानिक का कमाल
इस महान खोज की शुरुआत साल 1965 में हुई. सर्जियो फेरेरा नाम के एक युवा ब्राजीलियन फार्माकोलॉजिस्ट ने अपनी पीएचडी थीसिस के आधार पर ‘ब्रिटिश जर्नल ऑफ फार्माकोलॉजी’ में एक रिसर्च पेपर छापा.
सर्जियो ने सांप के जहर का एक्सट्रैक्ट निकाला और पाया कि इसमें एक खास तरह का पदार्थ मौजूद है. ये पदार्थ शरीर में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले ‘ब्रेडिकिनिन’ नाम के पेप्टाइड के असर को बहुत ज्यादा बढ़ा देता था. ब्रेडिकिनिन का काम शरीर की रक्त वाहिकाओं को फैलाना और ब्लड प्रेशर को कम करना होता है. सर्जियो ने पहचाना कि सांप के जहर में मौजूद ‘ब्रेडिकिनिन-पोटेंशिएटिंग पेप्टाइड्स’ ही वो जादुई चाबी हैं, जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.
ACE एंजाइम का रहस्य: शरीर के अंदर कैसे काम करता है BP का सिस्टम?
जब वैज्ञानिकों ने इस पेप्टाइड पर गहराई से शोध किया, तो उनका ध्यान शरीर के एक बेहद महत्वपूर्ण एंजाइम पर गया, जिसे ACE (Angiotensin-Converting Enzyme) कहा जाता है.लसामान्य परिस्थितियों में हमारे शरीर में ACE का काम दो तरह से होता है.
ये ‘एंजियोटेंसिन I’ को ‘एंजियोटेंसिन II’ में बदलता है. एंजियोटेंसिन II एक ऐसा रसायन है जो नसों को सिकोड़ देता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है.
इसके अलावा, ACE एंजाइम ब्रेडिकिनिन को तोड़कर खत्म कर देता है, जो नसों को आराम पहुंचाने का काम करता है.
वैज्ञानिकों ने देखा कि ब्राजीलियन पिट वाइपर का जहर सीधे इस ACE एंजाइम को ही ब्लॉक कर देता है. जब ACE ब्लॉक हो गया, तो न तो नसें सिकुड़ पाईं और न ही ब्रेडिकिनिन नष्ट हुआ. नतीजा ये हुआ कि रक्त वाहिकाएं चौड़ी हो गईं और ब्लड प्रेशर तेजी से नीचे आ गया.
जहर के पेप्टाइड से लैब की पहली गोली तक की मुश्किल चुनौती
सांप के जहर के इस जैविक प्रभाव को समझना तो बस पहली शुरुआत थी. असली चुनौती ये थी कि इस खोज को एक ऐसी दवा में कैसे बदला जाए, जिसे मरीज रोजाना आसानी से खा सकें.
शुरुआती रिसर्च में वैज्ञानिकों ने जहर से निकाले गए ‘टेप्रोटाइड’ (Teprotide) नामक पेप्टाइड का इस्तेमाल करके देखा. इसने ACE को ब्लॉक किया और ब्लड प्रेशर भी कम किया, लेकिन इसके साथ एक बहुत बड़ी समस्या थी, इसे गोली (Tablet) के रूप में पेट के जरिए नहीं लिया जा सकता था, इसे सिर्फ इंजेक्शन से देना पड़ता था. रोज-रोज BP के मरीज को इंजेक्शन देना प्रैक्टिकल नहीं था.
वैज्ञानिकों को एक ऐसे मॉलिक्यूल की जरूरत थी, जो लैब में तैयार हो सके, पेट में जाकर पच सके और गोली के रूप में खाया जा सके. सालों की कड़ी मेहनत, केमिकल्स में बदलाव और अनगिनत प्रयोगों के बाद आखिरकार कैप्टोप्रील का आविष्कार हुआ. ये दुनिया की पहली खाने वाली ACE Inhibitor दवा बनी.
1981: US FDA की मंजूरी और मेडिकल साइंस में नया सवेरा
15 से 20 सालों के लंबे शोध, टेस्टिंग और क्लिनिकल ट्रायल्स के बाद साल 1981 में अमेरिका की ‘फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ ने कैप्टोप्रील को हाई ब्लड प्रेशर के इलाज के लिए आधिकारिक मंजूरी दे दी.
ये फार्माकोलॉजी के इतिहास में एक क्रांति की तरह था. इसने साबित कर दिया कि प्रकृति के सबसे खतरनाक जहर का सही इस्तेमाल करके इंसान के लिए जीवनरक्षक दवाएं बनाई जा सकती हैं. कैप्टोप्रील के आने के बाद हृदय रोगों के इलाज की पूरी दिशा ही बदल गई.
आज ये खोज इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
हाई ब्लड प्रेशर को ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है, क्योंकि इसके कोई साफ लक्षण नहीं दिखते, लेकिन ये धीरे-धीरे दिल, दिमाग और किडनी को खोखला कर देता है.
कैप्टोप्रील ने डॉक्टरों को ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने का एक नया और सीधा जैविक रास्ता दिखाया. इसके बाद ACE Inhibitors दवाओं की एक पूरी नई जनरेशन जैसे एनालाप्रिल, लिसिनोप्रिल तैयार हुई, जो आज दुनिया भर में करोड़ों मरीजों को दी जाती हैं. ये दवाएं न केवल हाइपरटेंशन, बल्कि हार्ट फेलियर और किडनी की बीमारियों के इलाज में भी बेहद मददगार साबित हो रही हैं.
सांप का जहर दवा नहीं है!
हालांकि, वैज्ञानिक इस बात पर सख्त जोर देते हैं कि इस रिसर्च का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि सांप का जहर खुद कोई दवा है. अगर कोई व्यक्ति ये सोचे कि सांप का जहर पीने या कटवाने से BP ठीक हो जाएगा, तो ये जानलेवा साबित हो सकता है.
सांप का कच्चा जहर एक खतरनाक कातिल है. वैज्ञानिकों ने केवल उसके अंदर छिपे ‘बायोलॉजिकल क्लू’ का इस्तेमाल किया. उस सुराग को समझकर, प्रयोगशाला में 20 साल तक शोध करके उसके हानिकारक तत्वों को हटाकर एक सुरक्षित गोली बनाई गई.
प्रकृति का वो खजाना जो आज भी अनसुलझा है
ब्राजील के घने जंगलों में रेंगने वाले एक पिट वाइपर से लेकर डॉक्टर के पर्चे पर लिखी जाने वाली ‘कैप्टोप्रील’ की गोली तक का ये सफर विज्ञान की सबसे खूबसूरत कहानियों में से एक है.
इस खोज ने साबित किया कि प्रकृति के पास हर बीमारी का जवाब छिपा हुआ है, बस जरूरत है तो उसे ढूंढने की दूरदर्शिता और वैज्ञानिक लगन की. आज भी दुनिया भर के वैज्ञानिक सांप, बिच्छू, समुद्री जीवों और जहरीले पौधों के बायो-मॉलिक्यूल्स पर रिसर्च कर रहे हैं, ताकि कैंसर, डायबिटीज और दिल की बीमारियों के नए इलाज खोजे जा सकें.



