पारंपरिक तालाबों से सुरक्षित पेयजल की अनोखी व्यवस्था

Last Updated:November 17, 2025, 22:03 IST
नागौर के मारवाड़ क्षेत्र का बासनी कस्बा अपनी पारंपरिक जल संस्कृति के लिए जाना जाता है. यहां के लोग पीने के लिए नहर के बजाय बारिश के पानी से भरे तालाबों पर भरोसा करते हैं. कस्बे में दो बड़े तालाब हैं, जिन्हें मजबूत चारदीवारी और लोहे के गेट से सुरक्षित किया गया है, और चौकीदार लगातार पहरा देते हैं. तालाबों से पानी लेने के लिए कूपन और डायरी प्रणाली लागू है, जिससे अनुशासन और संरक्षण सुनिश्चित होता है.
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नागौर. मारवाड़ का इलाका आज भी अपनी पारंपरिक जल संस्कृति को संजोए हुए है, नागौर जिला मुख्यालय से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित बासनी कस्बा इसका जीवंत उदाहरण है. आधुनिक सुविधाओं के दौर में भी यहां के लोग पीने के पानी के लिए नाड़ी-तालाब पर ही निर्भर हैं. यही कारण है कि कस्बे में मौजूद जल स्रोतों की सफाई, सुरक्षा और संरक्षण को लेकर बेहद सख्त व्यवस्था लागू है.
करीब 50 हजार की आबादी वाला यह मुस्लिम बहुल्य कस्बा पिछले वर्ष ही नगरपालिका में शामिल किया गया था, यहां नहर का पानी सप्लाई जरूर होता है, लेकिन स्थानीय लोग इसे केवल नहाने, धोने और पशुओं को पानी पिलाने तक सीमित रखते हैं. पीने के लिए वे आज भी बारिश के जल से भरे पारंपरिक तालाबों पर भरोसा करते हैं. उनका मानना है कि तालाब का पानी मिनरल वाटर से भी बेहतर और अधिक शुद्ध होता है.
तालाबों के बाहर चौकीदार लगातार पहरा देते हैं
बासनी गांव में दो बड़े तालाब हैं, जिनके चारों ओर मजबूत चारदीवारी बनाई गई है, दोनों तालाबों के प्रवेश द्वार पर लोहे के गेट लगाए गए हैं और अनाधिकृत प्रवेश रोकने के लिए इन पर ताले जड़े रहते हैं. तालाबों के बाहर चौकीदार लगातार पहरा देते हैं, ताकि कोई व्यक्ति या पशु जल स्रोतों को गंदा न कर सके. समाजसेवी मोहम्मद अनवर चौहान बताते हैं कि ग्रामीण इन तालाबों को अपने घर का परिंडा मानकर इसकी सफाई और रखरखाव में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं, सुरक्षा भी इसी समुदाय द्वारा व्यवस्थित की जाती है.
कूपन और डायरी सिस्टम लागू
बासनी की साबरी नाड़ी से केवल घड़े भरकर पानी ले जाने की अनुमति है, यहां अनुशासन इतना सख्त है कि जब महिलाएं पानी भरने आती हैं, तब पुरुषों को उस क्षेत्र में बैठने की भी अनुमति नहीं होती. रात के समय तालाब क्षेत्र में बैठना या रुकना पूरी तरह प्रतिबंधित है, नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ स्थानीय कमिटी तुरंत कार्रवाई करती है. कस्बे से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित गोरधन सागर तालाब से पानी के टेंकर भरकर ले जाने की व्यवस्था भी है, लेकिन इसके लिए बासनी चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा कूपन और डायरी सिस्टम लागू किया गया है.
कूपन जारी करने वाले मोहम्मद आसिफ अली बताते हैं कि हर घर को एक निर्धारित समय अंतराल के बाद ही नया कूपन मिलता है. एक बार कूपन लेने के बाद ढाई महीने तक दूसरा कूपन जारी नहीं किया जाता. ट्रस्ट की डायरी में एंट्री के बाद ही टेंकर भरने की अनुमति दी जाती है, यह कूपन बिल्कुल निःशुल्क होते हैं. बासनी के लोग कहते हैं कि वर्षों से वे केवल बारिश के पानी का ही सेवन करते आए हैं और इसे स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे उत्तम मानते हैं. तालाबों की सफाई इतनी नियमित और व्यवस्थित होती है कि पानी बिल्कुल स्वच्छ और पीने योग्य बना रहता है. आधुनिक जल स्रोतों के बावजूद यहां के लोग अपनी जल विरासत को न केवल संजोए हुए हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित भी कर रहे हैं.
Hello I am Monali, born and brought up in Jaipur. Working in media industry from last 9 years as an News presenter cum news editor. Came so far worked with media houses like First India News, Etv Bharat and NEW…और पढ़ें
Hello I am Monali, born and brought up in Jaipur. Working in media industry from last 9 years as an News presenter cum news editor. Came so far worked with media houses like First India News, Etv Bharat and NEW… और पढ़ें
Location :
Nagaur,Rajasthan
First Published :
November 17, 2025, 22:03 IST
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नागौर के इस गांव में है पारंपरिक तालाबों से सुरक्षित पेयजल की अनोखी व्यवस्था



