45°C की तपिश में इंसानियत जिंदा! रेगिस्तान में महिलाएं रोज़ पैदल चलकर पशु-पक्षियों को पिला रहीं जीवन का पानी

Last Updated:April 30, 2026, 11:29 IST
Rajasthan Heatwave Crisis: भीषण गर्मी और नहरबंदी के दोहरे संकट के बीच राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में मानवता की अनूठी मिसाल देखने को मिल रही है. जहां पानी की भारी किल्लत है, वहीं गांव की महिलाएं अपना घर-गृहस्थी का काम छोड़कर तपती दोपहर में मीलों पैदल चलकर मूक पशु-पक्षियों के लिए जल सेवा कर रही हैं. यह निस्वार्थ सेवा न केवल गर्मी में पशु-पक्षियों की प्यास बुझा रही है, बल्कि भीषण लू और तपिश से उनके जीवन को बचाने का भी काम कर रही है. इन महिलाओं की संवेदनशीलता यह सिखाती है कि करुणा की भावना से बड़ी कोई प्रार्थना नहीं होती. इनका जज्बा आज पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है.
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बीकानेर. धोरों की धरती बीकानेर इन दिनों भीषण गर्मी और नहरबंदी की दोहरी मार झेल रही है. तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच चुका है, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. जहां इंसान किसी तरह पानी का जुगाड़ कर लेता है, वहीं बेजुबान पशु-पक्षियों के सामने जीवन का संकट खड़ा हो गया है. पानी की तलाश में वे इधर-उधर भटक रहे हैं और कई बार लंबी दूरी तय करने के बावजूद उन्हें पानी नसीब नहीं हो पाता.
इसी बीच शहर के गंगाशहर और भीनासर से सटी करीब 11 हजार बीघा में फैली गोचर भूमि में एक अनूठी और प्रेरणादायक पहल देखने को मिल रही है. यहां की महिलाएं तपती धूप में सिर पर पानी से भरी मटकियां रखकर कई किलोमीटर पैदल चलती हैं और गोचर में बने खेळियों (छोटे जल स्रोत) तथा पाळसियों में पानी भरकर पशु-पक्षियों की प्यास बुझा रही हैं. भीषण गर्मी और नहरबंदी के इस कठिन दौर में बीकानेर की ये महिलाएं यह साबित कर रही हैं कि सच्ची सेवा वही है, जो बिना किसी प्रचार के, निस्वार्थ भाव से की जा सकती है.
संस्कार और जिम्मेदारी का हिस्सा बन चुकाअमरपुरा और भीनासर क्षेत्र की 70 से अधिक महिलाएं इस सेवा कार्य में जुटी हुई हैं. खास बात यह है कि यह कोई नई पहल नहीं, बल्कि 20 से 30 वर्षों से चली आ रही परंपरा है. यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है. सास से बहू और मां से बेटी तक. महिलाओं के लिए यह सिर्फ सेवा नहीं, बल्कि संस्कार और जिम्मेदारी का हिस्सा बन चुका है. मंजू देवी बताती हैं कि वे वर्षों से गोचर में जाकर पशु-पक्षियों के लिए पानी डाल रही हैं, ताकि कोई भी जीव प्यास से न मरे. वहीं संतोषी देवी कहती हैं कि वे रोजाना 1 से 2 किलोमीटर पैदल चलकर गायों के लिए पानी लेकर जाती हैं. किरण देवी के अनुसार, वे पिछले 20 वर्षों से लगातार इस सेवा में लगी हुई हैं और हर दिन गोचर में बनी कई खेलियों को भरने का प्रयास करती हैं.
आस्था और प्रकृति के प्रति प्रेम को भी व्यक्त करतीमहिलाएं रोजाना शाम करीब चार बजे समूहों में घरों से निकलती हैं और डेढ़ से दो घंटे तक गोचर भूमि में रहकर हर खेळी में पानी भरती हैं. इस दौरान वे न केवल पशु-पक्षियों की सेवा करती हैं, बल्कि भजन-कीर्तन और लोकगीतों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती हैं. “भाग बड़ो घर आई म्हारी तुलछां…” जैसे पारंपरिक गीतों के जरिए वे अपनी आस्था और प्रकृति के प्रति प्रेम को भी व्यक्त करती हैं.
वापसी के दौरान महिलाएं पेड़ों की छांव में बैठकर कथा, हरजस और बातपोशी करती हैं, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी जीवित बनी रहती हैं. उम्रदराज महिलाएं जो ज्यादा दूर नहीं जा पातीं, वे भी समूह का उत्साह बढ़ाती हैं और इस सेवा का हिस्सा बनती हैं.
पर्यावरण संरक्षण और संवेदनशीलता का संदेशगौरतलब है कि इस विस्तृत गोचर क्षेत्र में गर्मी के दिनों में पानी की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है. ऐसे में इन महिलाओं की मेहनत हजारों पशु-पक्षियों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही है. यह पहल न सिर्फ जीव-दया का उदाहरण है, बल्कि समाज को पर्यावरण संरक्षण और संवेदनशीलता का संदेश भी देती है.
About the AuthorJagriti Dubey
Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें
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Location :
Bikaner,Rajasthan
First Published :
April 30, 2026, 11:29 IST



