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रेगिस्तान की आक बनेगी ठंड की ढाल, रेशों से बनाए जा रहे जैकेट-रजाइयां, -40 डिग्री तापमान में भी देगी शरीर को गर्माहट

Last Updated:January 05, 2026, 09:52 IST

जिस आक को अब तक रेगिस्तान में बेकार झाड़ समझा जाता था, वही आक अब कड़ाके की ठंड का सबसे बड़ा हथियार बन रही है. सरहदी बाड़मेर की रेतीली धरती पर बहुतायत में उगने वाली आक के रेशों से अब जैकेट और रजाइयां तैयार की जा रही हैं जो माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी शरीर को गर्म रखने में सक्षम है. यह तकनीक न सिर्फ इको-फ्रेंडली है, बल्कि स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग का उदाहरण भी है. पहले चरण में 150 क्विंटल आक की पाड़ियां एकत्र की गई हैं.रेतीली धरती पर आक बहुतायत में होता है

रेतीले बाड़मेर में बहुतायत में उगने वाली आक अब जैकेट और रजाइयों का मजबूत आधार बन रही है. आक के रेशों से तैयार किए जा रहे उत्पाद अत्यधिक ठंड में भी बेहतर गर्मी देने में सक्षम हैं. विशेषज्ञों के अनुसार आक के रेशों से बनी जैकेट और रजाइयां माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी शरीर को गर्म रख सकती हैं. यह तकनीक पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग भी कर रही है. पहले चरण में बाड़मेर क्षेत्र से करीब 150 क्विंटल आक की पाड़ियां एकत्र की गई हैं. इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिलने लगे हैं.

यह आक बिना पानी और खाद के भी आसानी से उग जाता है इसलिए यह इको फ्रेंडली होता है

आक के फलों यानी पाड़ियों के भीतर मौजूद रेशे प्राकृतिक रूप से बेहद हल्के, गर्मी को रोकने वाले और नमी से सुरक्षित होते हैं. इन गुणों के कारण अब आक के रेशों को ऊन और सिंथेटिक फाइबर के बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. आक के रेशे ताप को लंबे समय तक बनाए रखते हैं, जिससे ठंड से बेहतर सुरक्षा मिलती है. खास बात यह है कि आक का पौधा बिना ज्यादा पानी और खाद के भी आसानी से उग जाता है. यही कारण है कि आक पूरी तरह इको-फ्रेंडली और टिकाऊ प्राकृतिक संसाधन बनकर उभर रही है.

पहले चरण में करीब 150 क्विंटल से अधिक आक इकट्ठा किया हुआ है.

इस नवाचार के तहत पहले चरण में बाड़मेर जिले से करीब 150 क्विंटल आक की पाड़ियां एकत्र की गई हैं. इन पाड़ियों को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस कर उनके भीतर मौजूद रेशे निकाले जाएंगे. इन रेशों से जैकेट, रजाइयां और अन्य शीतरोधी उत्पाद तैयार किए जाएंगे, जो अत्यधिक ठंड में भी प्रभावी रहेंगे. परियोजना से स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे. विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में इस पहल का दायरा और बढ़ाया जाएगा, ताकि आक आधारित उत्पादों का बड़े स्तर पर उत्पादन किया जा सके.

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सेना, पर्वतीय क्षेत्रों और ठंड वाले इलाकों में यह काफी कारगर होगा

आक के रेशों से बने जैकेट और रजाइयां पारंपरिक ऊनी कपड़ों की तुलना में काफी हल्के होते हैं, लेकिन गर्मी बनाए रखने की उनकी क्षमता कहीं अधिक होती है. ये उत्पाद शरीर की गर्माहट को लंबे समय तक सुरक्षित रखते हैं और नमी से भी बचाव करते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार माइनस तापमान वाले क्षेत्रों में भी ये प्रभावी साबित हो सकते हैं. सेना, पर्वतीय इलाकों और अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों में इनकी उपयोगिता विशेष रूप से कारगर मानी जा रही है. हल्के होने के कारण इन्हें पहनना और ले जाना भी आसान होता है, जिससे कठिन परिस्थितियों में काम करने वालों को बड़ा लाभ मिल सकता है.

इसके रेशों से उच्च गुणवत्ता के कपड़े तैयार किए जाएंगे.

इस पहल से बाड़मेर के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर खुलेंगे. आक के संग्रहण, प्रोसेसिंग और उससे उत्पाद निर्माण की पूरी प्रक्रिया में स्थानीय लोगों को सीधा लाभ मिलेगा. ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान के सहयोग से रूमा देवी फाउंडेशन ने आक के बीजों से निकलने वाले रेशों से उच्च गुणवत्ता का कपड़ा तैयार कर उससे विभिन्न उत्पाद बनाना शुरू कर दिया है. अंतरराष्ट्रीय फैशन डिजाइनर डॉ. रूमा देवी के अनुसार रेगिस्तान में बहुतायत में उगने वाला आक अब स्थानीय लोगों के लिए कमाई का मजबूत जरिया बनेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी.

इसका वजन दूसरे फाइबर की तुलना में हल्का होता है जिससे यह पर्वतीय क्षेत्रों में भी आसानी से ले जा सकते है

कभी खेतों और चारागाहों में अनदेखी की जाने वाली आक अब बाड़मेर की नई पहचान बनती जा रही है. अंतरराष्ट्रीय फैशन डिजाइनर डॉ. रूमा देवी के अनुसार आक के रेशों से स्लीपिंग बैग, जैकेट सहित कई उत्पाद तैयार किए गए हैं, जो माइनस 20 से माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी सैनिकों को सुरक्षा दे सकते हैं. खास बात यह है कि आक से बने ये उत्पाद अन्य फाइबर की तुलना में बेहद हल्के होते हैं. हल्के वजन के कारण इन्हें पहाड़ी और बर्फीले इलाकों में ले जाना आसान होता है, जिससे सेना और पर्वतीय क्षेत्रों में इनकी उपयोगिता और बढ़ जाती है.

इसके पत्ते बरगद के समान होते है और फल आम के बराबर होते है जिससे रेशे निकलते है

आक का वैज्ञानिक नाम कैलोट्रिपोस जाइगैन्टिया है. इसे मंदार, आक, अर्क और अकौआ भी कहा जाता है. आक का पौधा आकार में छोटा और छत्तादार होता है. इसके पत्ते बरगद के पत्तों की तरह मोटे और चौड़े होते हैं. इसके फल आम के समान आकार के होते हैं, जिनके भीतर रूई जैसे रेशे पाए जाते हैं. आक की शाखाओं से दूध जैसा रस निकलता है. आयुर्वेद में आक का विशेष महत्व बताया गया है. इसका उपयोग प्राचीन काल से कई रोगों के उपचार और स्वास्थ्य लाभ के लिए किया जाता रहा है.

First Published :

January 05, 2026, 09:52 IST

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रेगिस्तान की आक बनेगी ठंड की ढाल, -40 डिग्री में भी जैकेट-रजाइयां देगी गर्मी

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