New Bajra and Moth Varieties for Rajasthan | बाजरा और मोठ की उन्नत किस्में

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सूखे में भी लहलहाएगी फसल! वैज्ञानिकों ने खोजी बाजरा और मोठ की नई किस्में
Last Updated:April 16, 2026, 11:25 IST
New Bajra and Moth Varieties for Rajasthan: बीकानेर में आयोजित जर्क बैठक में कृषि वैज्ञानिकों ने बाजरा की 2 और मोठ की 4 उन्नत किस्मों की अनुशंसा की है, जो शुष्क क्षेत्रों में सूखे के प्रति सहनशील हैं. इसके साथ ही तिल की फसल में मृदा परीक्षण के आधार पर वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन और नाइट्रोजन-फॉस्फोरस के संतुलित उपयोग की रणनीति तैयार की गई है. बैठक में पांच नई तकनीकों को परीक्षण के लिए भेजने का निर्णय लिया गया है, जिससे आने वाले समय में आधुनिक खेती और वैज्ञानिक पद्धतियों के माध्यम से मरुस्थलीय क्षेत्र के किसानों की आय और उत्पादन में बढ़ोतरी सुनिश्चित हो सके.
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बाजरा और मोठ की उन्नत किस्में
बीकानेर. राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में खेती को अधिक उत्पादक और किसानों के लिए लाभकारी बनाने की दिशा में स्वामी केशवानन्द राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. विश्वविद्यालय के कृषि अनुसंधान केन्द्र में आयोजित क्षेत्रीय अनुसंधान एवं विस्तार सलाहकार समिति (जर्क) की बैठक में कृषि वैज्ञानिकों ने खरीफ की प्रमुख फसलों को लेकर नई अनुशंसाएं जारी की हैं. इसमें बाजरा की 2 और मोठ की 4 ऐसी उन्नत किस्मों के चयन पर जोर दिया गया है, जो बीकानेर, जैसलमेर और चूरू जैसे शुष्क जिलों की विषम जलवायु में भी बेहतर परिणाम देने में सक्षम हैं. इन नई किस्मों की सबसे बड़ी विशेषता इनकी सूखा सहन करने की उच्च क्षमता है, जिससे कम वर्षा या अनिश्चित मानसून की स्थिति में भी किसानों को स्थिर पैदावार प्राप्त हो सकेगी.
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि मरुस्थलीय क्षेत्र की मिट्टी और सीमित जल संसाधनों को ध्यान में रखते हुए ही इन किस्मों को विकसित और अनुशंसित किया गया है. बैठक के दौरान यह जानकारी दी गई कि बाजरा और मोठ की ये चुनिंदा किस्में न केवल कीटों और रोगों के प्रति प्रतिरोधी हैं, बल्कि इनका पकने का समय भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल है. इन किस्मों को अपनाने से विशेष रूप से उन इलाकों के किसानों को राहत मिलेगी जहाँ सिंचाई के साधन सीमित हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि उन्नत बीजों का सही चुनाव ही उत्पादन बढ़ाने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है, जिससे खेती की लागत कम और मुनाफा अधिक होता है.
तिल की फसल में वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधनबैठक में तिल की खेती को लेकर भी एक विशेष रणनीति साझा की गई है. विशेषज्ञों के अनुसार, तिल की खेती में अब केवल पारंपरिक खाद या पुराने तरीकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा. फसल की गुणवत्ता और तेल की मात्रा बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से पोषक तत्व प्रबंधन करना अनिवार्य है. वैज्ञानिकों ने मृदा परीक्षण यानी मिट्टी की जांच के आधार पर ही नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग करने की सलाह दी है. यदि किसान वैज्ञानिक पद्धति से खाद का प्रबंधन करते हैं, तो तिल की पैदावार के साथ-साथ उसकी बाजार कीमत में भी सुधार होगा. सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करके तिल के दानों की चमक और वजन में बढ़ोतरी की जा सकती है.
नई तकनीकों का परीक्षण और भविष्य की योजनाएंबैठक में केवल मौजूदा फसलों पर ही नहीं, बल्कि भविष्य की कृषि तकनीकों पर भी गहन मंथन किया गया. विशेषज्ञों ने तय किया है कि पांच नई कृषि तकनीकों को सत्यापन के लिए ग्राह्य परीक्षण केन्द्रों (ATC) पर भेजा जाएगा. इन तकनीकों के सफल परीक्षण और प्रमाणीकरण के बाद इन्हें सीधे किसानों तक पहुँचाया जाएगा, ताकि आधुनिक खेती के जरिए उनकी आय में वृद्धि की जा सके. काजरी बीकानेर और कृषि विभाग के अधिकारियों ने जल संरक्षण और विविधीकरण पर विशेष बल दिया. अधिकारियों ने बताया कि सरकारी योजनाओं और तकनीकी मार्गदर्शन के माध्यम से किसानों को लाभान्वित किया जा रहा है. उद्यान विभाग की ओर से भी फसलों के विविधीकरण और बागवानी को बढ़ावा देने का सुझाव दिया गया ताकि किसान बदलते जलवायु परिदृश्य में खुद को आत्मनिर्भर बना सकें.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें
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Location :
Bikaner,Bikaner,Rajasthan
First Published :
April 16, 2026, 11:25 IST



