इबोला पर बड़ी खबर, कांगो रिपब्लिक में इबोला की 2 वैक्सीन का ट्रायल शुरू, 1 भारत की

Last Updated:November 05, 2026, 14:49 IST
Ebola Vaccine: दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारियों में कुख्यात इबोला पर बड़ी खबर है. डब्ल्यूएचओ ने इबोला बीमारी को होने से रोकने के लिए 2 वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल को मंजूरी दे दी है. इनमें 1 भारत के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा विकसित की गई है. इबोला के कारण सबसे ज्यादा डेमोक्रेटिक रिबल्बिक ऑफ कांगो में परेशानी हुई है, इसलिए इसी देश में इसका पहला क्लिनिकल ट्रायल चलेगा. इबोला के कारण लगभग 80 प्रतिशत मरीजों की मौत हो जाती है.सीरम इंस्टीट्यूट द्वारा विकसित इबोला वैक्सीन का ट्रायल शुरू. Photo: Canva
Ebola Vaccine: इबोला भयंकर खतरनाक बीमारी है. कैंसर अगर आउट ऑफ कंट्रोल हो जाए तो भी थोड़ा समय मिल जाता है लेकिन इबोला में समय नहीं मिलता और यह वायरस 85 प्रतिशत से ज्यादा मरीजों को मौत की चपेट में ले लेता है. दुनिया भर के वैज्ञानिक इस नामुराद वायरस पर शिकंजा कसने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. इस कड़ी में बड़ी सफलता हाथ लगी है. वैज्ञानिकों द्वारा बनाई गई दो तरह की वैक्सीन को जबर्दस्त सफलता मिली है और अब इसका अंतिम परिणाम पाने के लिए क्लिनिकल ट्रायल शुरू हो गया है. खास बात यह है कि इनमें से 1 वैक्सीन भारत के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा विकसित की गई है. इसका नाम ChAdOx1 है. सीरम ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ इसे विकसित किया है. दूसरा वैक्सीन मॉडर्ना कंपनी की mRNA-1469 है. डब्ल्यूएचओ की तरफ से मंजूरी मिलने के बाद दोनों वैक्सीन का ट्रायल डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में किया जा रहा है.
वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि
इबोला बुंडीबुग्यो वायरस से होता है. इस वायरस का असर शरीर में कम से कम हो, इसलिए इन दोनों वैक्सीन का ट्रायल शुरू हुआ है. अब तक जो क्लीनिकल प्रमाण मिले हैं, उसके आधार पर डब्ल्यूएचओ के टेक्निकल एडवाइरी ग्रुप ऑन कैंडिडेट वैक्सीन प्रायोरिटाइजेशन ने इसी सप्ताह आगे के क्लिनिकल ट्रायल के लिए अपनी मंजूरी दे दी. डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडहानॉम गेब्रियेसस ने कहा कि पिछले कई वर्षों की मेहनत और विज्ञान की साझेदारी का प्रमाण है कि हम यहां तक पहुंचे हैं. अब हम क्लिनिकल ट्रायल में प्रवेश कर रहे हैं. इसके लिए हम दुनिया भर के वैज्ञानिकों, हेल्थ एक्सपर्टों और वैक्सीन विकसित करने वाले सहयोगियों का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं. उनकी भागीदारी से लाखों लोगों को इस मुसीबत से बचाया जा सकता है. यह टीका इबोला को खत्म करने में महत्वपूर्ण साथी बनेगा.
1976 में आया था इबोला
इबोला ऐसी बीमारी है जिसकी वजह से संक्रमित आधे लोगों की जान चली जाती है. कुछ मामलों में अन्य परेशानियां बढ़ जाती है और उस स्थिति में 90 प्रतिशत इबोला पीड़ित मर जाते हैं. पिछले कुछ सालों में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला ने आतंक मचा रखा है. कांगो में अब तक 10,500 से अधिक इबोला के मामले आ चुके हैं और इस कारण 5300 से ज्यादा लोगों की जानें चली गई हैं. कांगों के 8 राज्यों में इसका प्रकोप सबसे ज्यादा है. कांगो के अलावा पड़ोसी देश सुडान, युगांडा, केन्या, नाइजीरिया और यहां तक कि फ्रांस में भी इबोला के मामले सामने आ चुके हैं. सबसे पहले 1976 में इबोला सामने आई थी. यह एक साथ सुडान और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में फैला था. कांगो में याम्बुक गांव में यह बीमारी पहली बार एक इंसान को हुई थी. यह गांव इबोला नदी के किनारे था. इसलिए इसका नाम इबोला पड़ गया. इबोला वायरस चमगादड़ से इंसानों में आया.
शरीर के इम्यून सिस्टम को नष्ट कर देता
आम बोलचाल की भाषा में अब इसे इबोला वायरस ही कहा जाता है. इसके कई रूप है. जैरे इबोलावाइरस, बुंडिबुग्यो इबोलावाइरस, सूडान इबोलावाइरस,बॉम्बाली इबोलावाइरस आदि. इनमें बुंडिबुग्यो इबोलावाइरस सबसे खतरनाक है जिसके लिए टीका तैयार किया गया है. यह वायरस सिंग स्ट्रैंडेड आरएनए से बना होता है यानी बेहद सूक्ष्म धागे की तरह होता है. जब यह इंसानों में प्रवेश करता है तो इम्यून सिस्टम को पूरी तरह तहस-नहस कर देता है. यह वायरस खून की नलियों की अंदरुनी परत को नष्ट करने लगती है जिसकी वजह खून में थक्का जमना बंद हो जाता है और खून की नलियां लीक करने लगती है. इससे बहुत ज्यादा खून निकलता है और मल्टी ऑर्गेन फेल्योर हो जाता है.
लक्षण और इलाज
अगर किसी को इबोला शरीर में प्रवेश कर जाए तो 2 से 21 दिनों के अंदर इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं. शुरुआत में अचानक बुखार आता है और बहुत ज्यादा थकान होने लगती है. इसके साथ ही पूरे शरीर में थकावट होने लगती है, मांसपेशियों में दर्द करने लगता है. गले में खराश और सिर दर्द होने लगता है. जब यह और गंभीर होती है तो उल्टी और दस्त भी होने लगता. स्किन में चकत्ते होने लगते हैं. जल्दी ही किडनी और लिवर डैमेज होने लगता है. नाक, मसूड़ों या मल से खून आने लगता है. इंटरनल ब्लीडिंग भी बहुत होने लगती है. अब तक इसका कोई इलाज नहीं है. लक्षणों को कंट्रोल कर बीमारी को ठीक करने की कोशिश की जाती है.
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November 05, 2026, 14:49 IST



