किराये के कमरे में रहे, दोस्तों ने कर्फ्यू से निकाल भेजा मुंबई, कैसे एक हादसे ने बदली Mushtaq Khan की दुनिया

“मैं हॉकी का बहुत बड़ा प्लेयर था. लेकिन उदय भाई को मेरे किसी बात पर गुस्सा आ गया. ऐसे में उन्होंने मेरी ही हॉकी से मेरा पैर तोड़ दिया. लेकिन उदय भाई दिल के बहुत अच्छे है, जिन्होंने मुझे अस्पताल पहुंचाया और ऑपरेशन करवाकर नकली टांग भी लगवा दी.”
साल 2007 में आई वेलकम फिल्म का आइकॉनिक डायलॉग आपको याद ही होगा. इस डायलॉग को फरमाया था मुश्ताक अली खान ने. वह 24 सितंबर की शाम को दुनिया छोड़ चले गए. शुक्रवार के दिन यानी 25 सितंबर को उन्हें जुमे की नमाज के बाद मुंबई के यारी रोड स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो वह पांच साल पहले कैंसर से पीड़ित थे लेकिन वह ठीक हो गए थे. लेकिन फिर से वह कैंसर से पीड़ित हो गए और मुंबई के नानावटी अस्पताल में भर्ती कराए गए. वह चार सितंबर तक एक फिल्म की शूटिंग पर थे. लेकिन वह बीमार पड़ गए और 24 सितंबर की शाम को वह खबर आई, जिसने उनके चाहने वालों को निराश कर दिया.
बैहर में जन्में और बालाघाट में पढ़ेबॉलीवुड एक्टर मुश्ताक खान का जन्म बालाघाट जिले के बैहर में 31 दिसंबर 1959 को हुआ था. उनका परिवार कपड़ा और होटल व्यवसाय से जुड़ा हुआ था. उनकी शुरुआती पढ़ाई बैहर में ही हुई. बचपन से ही एक्टिंग का शौक था. ऐसे में वह रामलीला से लेकर के नाटकों में भी हिस्सा लेते हैं. फिर भोपाल और दिल्ली के रंगमंच (थिएटर) से जुड़कर उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखी.
बालाघाट में किराए के कमरे में रहेबैहर से वह बालाघाट पढ़ाई के लिए आए थे. वह यहां के पीजी कॉलेज से अर्थशास्त्र से एमए कर रहे थे. लेकिन फाइनल ईयर से पहले ही उन्होंने बालाघाट छोड़ दिया था. वह बालाघाट के ही राजकुमार रायजादा साल 1974 में बालाघाट आए थे. वह उनके घर में ही किराए से रहते थे. शरद श्रीवास्तव द्वारा निर्देशित नाटक ‘गुनाह’ में मुश्ताक खान को पहला अवार्ड मिला था. वे बिना किसी विषय की जानकारी के भी लंबे समय तक मिमिक्री कर सकते थे. शिवाजी पर जानकारी न होने के बावजूद उन्होंने 45 मिनट तक मिमिक्री की थी.
इस घटना के बाद बदली जिंदगीबालाघाट में सन 20 फरवरी 1975 को थाना कांड हुआ था, जिसमें कई युवाओं को पुलिस ने हिरासत में लिया था. ऐसे में बालाघाट में महीने भर तक कर्फ्यू का माहौल था. ऐसे में उनके पिता ने चिंता जताई कि बालाघाट में उनका करियर खराब न हो जाए. ऐसे में दोस्तों ने मिलकर तय किया और उन्हें छुपाते हुए जबलपुर की ट्रेन में बैठकर रवाना किया. वहां से वे मुंबई गए और फिर एक कलाकार बनकर ही बालाघाट लौटे. जब भी वे बालाघाट आते और घर आते, तो राजकुमार रायजादा और मुश्ताक एक-दूसरे को ‘लफाडू’ कहकर बुलाते थे.
पूर्व सांसद ने व्यक्त किया दुखबालाघाट के पूर्व सांसद कंकर मुंजारे का कहना है कि जब मुश्ताक खान बालाघाट पढ़ने आए थे. तब कुछ लोग उन्हें परेशान करते थे. ऐसे में वह कंकर से मदद मांगा करते थे. तब वह मुश्ताक को बदमाशों से बचाते थे. ऐसे में मुश्ताक भी कंकर के दोस्त बन गए थे. वह जब 1981 में मुंबई गए थे. तब मुश्ताक से मुलाकात भी की थी. मुश्ताक भी उनके चुनाव प्रचार में आते थे.
फुटपाथ से वेलकम तक का सफरबॉम्बे पहुंचकर उनके पास रहने को ठिकाना तक नहीं था. कई रातें उन्होंने रेलवे स्टेशन और फुटपाथ पर गुजारी. जेब में पैसे नहीं थे तो किराने वाले को पैसे देकर अपने लिए मैसेज मंगवाते थे.फिर किस्मत ने साथ दिया. उनके दोस्त सुरेश जारगर उन्हें IPTA थिएटर ले गए. वहां शंकर शेष के नाटक ‘द्रोणाचार्य’ में उनकी एक्टिंग देखकर सब दंग रह गए. वहीं से सईद मिर्जा की फिल्म ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ से 1980 में फिल्मों में एंट्री हुई.
उसके बाद 40 साल, 250 से ज्यादा फिल्में-आशिकी, हम हैं राही प्यार के, हेरा फेरी, गदर, मुझसे शादी करोगी और 2007 में आई वेलकम में बल्लू बनकर उन्होंने जो छाप छोड़ी, वो आज भी लोग नहीं भूले.



