डार और संचार तकनीक में नई उड़ान, नागौर पॉलिटेक्निक को IIT रुड़की संग 30 लाख की परियोजना

Last Updated:September 26, 2026, 15:46 IST
Nagaur Polytechnic Research Project: नागौर राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज और IIT रुड़की के संयुक्त शोध प्रोजेक्ट को AICTE की लैब टू मार्केट-2025 योजना के तहत 30 लाख रुपए का बजट मिला है. परियोजना में आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग तकनीक से स्वदेशी, हल्के और मजबूत रेडोम विकसित किए जाएंगे, जिनका उपयोग रडार, निगरानी और संचार प्रणालियों में किया जा सकता है.
राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज, नागौर के इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग के प्राध्यापक कमल गुर्जर और आईआईटी रुड़की के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग के प्राध्यापक डॉ. उत्पल डे को संयुक्त शोध परियोजना के लिए 30 लाख रुपए का बजट स्वीकृत हुआ है. यह स्वीकृति अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) की रिसर्च प्रमोशन स्कीम लैब टू मार्केट-2025 के तहत मिली है. परियोजना में आधुनिक तकनीक की मदद से उन्नत और स्वदेशी रेडोम विकसित करने पर काम किया जाएगा.
रेडोम क्या होता है और इसका उपयोग कहां होता है, इसे समझना भी जरूरी है. रेडोम रडार या संचार एंटीना के ऊपर लगाया जाने वाला विशेष सुरक्षात्मक आवरण होता है. यह एंटीना को बारिश, धूल, तेज हवा और अन्य मौसम संबंधी परिस्थितियों से बचाने का काम करता है. साथ ही इसकी संरचना इस तरह तैयार की जाती है कि रेडियो तरंगों के आवागमन पर कम से कम असर पड़े. आधुनिक रडार, संचार और निगरानी प्रणालियों में इसका उपयोग होता है.
परियोजना में एडिटिव और सब्ट्रैक्टिव मैन्युफैक्चरिंग तकनीक पर काम होगा. एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग में थ्रीडी प्रिंटिंग जैसी तकनीकों के जरिए सामग्री को परत-दर-परत जोड़कर संरचना तैयार की जाती है. वहीं सब्ट्रैक्टिव मैन्युफैक्चरिंग में सामग्री को काटकर या हटाकर आवश्यक आकार दिया जाता है. दोनों तकनीकों के इस्तेमाल से अलग-अलग डिजाइन और संरचनाओं का परीक्षण किया जाएगा. इसका उद्देश्य जरूरत के मुताबिक हल्के, मजबूत और बेहतर प्रदर्शन करने वाले रेडोम तैयार करना है.
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तीन साल की प्रारंभिक अवधि में डिजाइन से लेकर प्रोटोटाइप तक काम किया जाएगा. शोध के दौरान रेडोम के डिजाइन, निर्माण, सामग्री, तकनीकी क्षमता और प्रदर्शन से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अध्ययन होगा. तैयार किए गए मॉडल का परीक्षण करके उसकी उपयोगिता और कार्यक्षमता का आकलन किया जाएगा. शोध से प्राप्त परिणामों के आधार पर ऐसे प्रोटोटाइप विकसित करने का प्रयास होगा, जिन्हें आगे व्यावहारिक और औद्योगिक जरूरतों के अनुसार विकसित किया जा सके.
रक्षा क्षेत्र में इसके उपयोग काफी अहम माने जा रहे हैं. भविष्य में इस तकनीक से विकसित रेडोम का इस्तेमाल रडार, निगरानी प्रणाली और विभिन्न संचार प्रणालियों में किया जा सकता है. इसके अलावा नागरिक क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले संचार और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में भी इसकी उपयोगिता हो सकती है. परियोजना का फोकस केवल प्रयोगशाला में शोध करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विकसित तकनीक को वास्तविक उपयोग और संभावित औद्योगिक जरूरतों तक पहुंचाने पर रहेगा.
नागौर पॉलिटेक्निक कॉलेज के लिए राष्ट्रीय स्तर की यह परियोजना बड़ी उपलब्धि है. आईआईटी रुड़की जैसे संस्थान के साथ संयुक्त रूप से शोध करने का अवसर कॉलेज के प्राध्यापकों और विद्यार्थियों के लिए तकनीकी अनुभव बढ़ाने वाला होगा. इससे विद्यार्थियों को आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, रडार और संचार तकनीक से जुड़े शोध कार्यों को समझने का अवसर मिल सकता है. कॉलेज में नवाचार और शोध की गतिविधियों को भी इससे बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
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September 26, 2026, 15:46 IST



