चमक दमक भरी जिंदगी फिर भी क्यों भीतर से टूट रहे NCR के लोग? बचने का सिर्फ एक रास्ता

नोएडा. ऊंची इमारतें, चमचमाती सोसाइटियां और आधुनिक जीवनशैली के बीच एनसीआर में अकेलापन एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनता जा रहा है. आसपास सैकड़ों लोग होने के बावजूद कई लोग भावनात्मक रूप से खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं. लोकल 18 ने इस बारे में नोएडा के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. आरके बंसल से बात की. वे बताते हैं कि अकेलापन और आत्महत्या सिर्फ हाईराइज सोसाइटियों की समस्या नहीं है, बल्कि शहरों के साथ गांवों में भी ऐसे मामले सामने आते हैं. व्यक्ति का सामाजिक ढांचा, दोस्तों और परिवार से संबंध, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से संपर्क और नशे की आदत जैसी चीजें उसके मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती हैं. डॉ. बंसल के अनुसार इस दूरी को बढ़ाने में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है. आज लोग फोन और सोशल मीडिया के जरिए संपर्क में तो हैं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मिलने और बातचीत करने का चलन कम हो रहा है.
डॉ. बंसल कहते हैं कि उनके पास ऐसे मरीज भी आते हैं जो पूरी रात सोशल मीडिया पर लगे रहते हैं, सुबह 8-9 बजे सोते हैं और शाम 7-8 बजे उठते हैं. इसके बाद खाना खाने के बाद फिर मोबाइल में लग जाते हैं. पिछले करीब दो दशकों में मोबाइल फोन ने लोगों की दिनचर्या को काफी बदल दिया है. अब सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि मिडिल एज और बुजुर्ग भी आभासी दुनिया में अधिक समय बिता रहे हैं. बच्चों में भी आउटडोर खेलों की जगह मोबाइल गेम बढ़ रहे हैं, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है.
नहीं मिल रहा मौका
डॉ. बंसल के मुताबिक उनके पास मानसिक दबाव से जुड़े मामलों में रिश्तों का टूटना, पति-पत्नी के बीच विवाद, तलाक, अफेयर, शक, एक-दूसरे को समय न दे पाना, कर्ज और नशे से जुड़ी समस्याएं मुख्य रूप से सामने आ रही हैं. नोएडा जैसे शहरों में शिफ्ट में काम करने वालों की संख्या भी काफी है. कई बार पति-पत्नी की ड्यूटी अलग-अलग समय पर होने के कारण उन्हें एक-दूसरे से बात करने और साथ समय बिताने का मौका नहीं मिल पाता. डॉ. बंसल कहते हैं कि संबंध तभी मजबूत होते हैं, जब दोनों एक-दूसरे को समय दें, बातचीत करें और एक-दूसरे की देखभाल करें. कर्ज में फंसे लोग भी कई बार अपनी परेशानी माता-पिता, भाई-बहनों या परिवार से साझा नहीं करते. नशे के कारण हुआ कर्ज हो या परिवार से भावनात्मक दूरी, दोनों स्थितियां व्यक्ति की परेशानी को बढ़ा सकती हैं.
खुद आदमी बढ़ा लेता है परेशानी
डॉ. बंसल कहते हैं कि उनके पास आने वाले मरीजों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है, जिन्हें लगता है कि उनकी समस्या बहुत बड़ी है. 99 प्रतिशत मामलों में व्यक्ति अपनी समस्या को सोच-सोचकर इतना बड़ा बना लेता है कि उसे लगता है कि उसके सामने कोई रास्ता नहीं बचा. हालांकि मानसिक बीमारी या डिप्रेशन को नजरअंदाज करने की बात नहीं है. जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक से संपर्क करने, काउंसलिंग लेने और आवश्यकता होने पर दवा ली जा सकती है. डॉ. बंसल के मुताबिक उनके पास अलग-अलग तरह के सामाजिक और रिश्तों से जुड़े मामले आते हैं, जिनमें कई बार व्यक्ति अपनी निजी परेशानियां परिवार तक नहीं पहुंचा पाता.
कोई भी परेशानी स्थायी नहीं
आत्महत्या के विचार पर डॉ. बंसल कहते हैं कि कई बार ऐसा विचार क्षणिक होता है और कुछ सेकंड या कुछ मिनट में व्यक्ति के दिमाग पर हावी हो जाता है. ऐसे समय व्यक्ति को अकेला नहीं रहना चाहिए और तुरंत किसी दोस्त, माता-पिता, भाई-बहन, पड़ोसी या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से फोन पर बात करनी चाहिए. कुछ समय बातचीत में निकल जाए तो विचार की तीव्रता कम हो सकती है. डॉ. बंसल के मुताबिक जीवन में कोई भी परिस्थिति स्थायी नहीं होती. खराब समय के बाद परिस्थितियां बदल सकती हैं. इसलिए किसी समस्या को अंतिम मानकर घबराने के बजाय उसे अपने लोगों से साझा करना चाहिए.
श्रीमद्भगवद्गीता क्यों पढ़ना जरूरी
डॉ. बंसल बताते हैं कि आसपास का कोई व्यक्ति अगर व्यवहार में अचानक बदलाव, अत्यधिक तनाव या निराशा देखे तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए. हाईराइज सोसाइटियों में पार्क और कॉमन एरिया जैसी जगहें लोगों को एक-दूसरे से मिलने का मौका देती हैं. अगर व्यक्ति कमरे में बंद रहने के बजाय बाहर निकले और लोगों से बातचीत करे तो सामाजिक संपर्क बढ़ सकता है. डॉ. बंसल ने श्रीमद्भगवद्गीता को एक तरह की काउंसलिंग पुस्तक बताते हुए कहा कि उसमें जीवन की समस्याओं और उनके समाधान पर संवाद मिलता है.



