चाइनीज लाइटों की चमक के बीच कायम है मिट्टी के दीयों का जादू, 3 पीढ़ियों से विरासत संभाल रहा कोटा का परिवार

Last Updated:October 25, 2026, 11:42 IST
Kota Clay Diyas: कोटा में धनराज प्रजापत का परिवार पिछले 3 पीढ़ियों से मिट्टी के दीये बनाने की परंपरा को जिंदा रखे हुए है. पिछले 40 साल से इस हुनर को संभाल रहे धनराज दिवाली पर करीब 40 हजार दीये तैयार करते हैं. चाइनीज लाइटों और मशीनों से बने सजावटी सामान के दौर में उनका परिवार हाथों से बने इको-फ्रेंडली दीयों के जरिए संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहा है.
कोटा. दिवाली आते ही बाजार रंग-बिरंगी लाइटों और आकर्षक सजावटी सामानों से सज जाते हैं, लेकिन इन चमक-दमक के बीच मिट्टी के दीयों की परंपरा आज भी कायम है. कोटा के गीता भवन के पास करीब एक दंपति पिछले 35 से 40 वर्षों से मिट्टी के दीये बनाकर अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, यह चिकनी मिट्टी से इको-फ्रेंडली दीपक तैयार कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे है. करीब 55 वर्षीय धनराज प्रजापत के परिवार में मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का काम तीन पीढ़ियों से चला आ रहा है. धनराज पिछले 35 से 40 वर्षों से इस हुनर को संभाले हुए हैं, त्योहारों के सीजन में वे करीब एक महीने तक दिन-रात मेहनत करके दीये, कलश और मटकियां तैयार करते हैं.
इस काम में उनकी पत्नी और बड़ी बेटी भी हाथ बंटाती हैं. मिट्टी को छानने, गलाने और गूंथने से लेकर चाक पर दीयों को आकार देने तक की प्रक्रिया में काफी मेहनत और धैर्य लगता है. धनराज सीजन के दौरान करीब 40 हजार दीये और मिट्टी से बने सभी सामान तैयार करते हैं. मिट्टी और तैयारी पर ही लगभग 10 हजार रुपये खर्च हो जाते हैं, इसके अलावा दीये बेहद कम कीमत पर बेचने पड़ते हैं. बदलते दौर में मशीनों से बने सामान और चाइनीज लाइटों की बढ़ती मांग के बीच धनराज जैसे कारीगर पारंपरिक कला को जिंदा रखने में जुटे हैं.
चिकनी मिट्टी से तैयार हो रहे इको-फ्रेंडली दीपक
चिकनी मिट्टी के मिश्रण से आकर्षक दीपक तैयार कर रहा है, इन दीपकों को धनराज प्रजापत कारीगर अपनी रचनात्मकता से इन पर सुंदर नक्काशी और डिजाइन बनाती हैं. इस पहल का त्योहारों पर प्राकृतिक सामग्री से बने उत्पादों को बढ़ावा देना. इन दीपकों की अच्छी खासियत इनकी सुंदर और आकर्षक बनावट है. इस्तेमाल के बाद इनकी उपयोगिता के अनुसार इन्हें मिट्टी में मिलाने या खाद बनाने में इस्तेमाल करने की संभावना भी रहती है. हालांकि, इसके लिए दीपक में इस्तेमाल की गई और भी सामग्री का ध्यान रखना जरूरी होता है.
इन कारीगर की मेहनत में ग्राहकों की आस्था भी
धनराज से दीये खरीदने पहुंचने वाली अर्चना राजावत का कहना है कि मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगर हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा हैं. मशीनों से सामान जल्दी तैयार हो सकता है, लेकिन हाथों से बने दीयों में कारीगर की मेहनत जुड़ी होती हैं. मिट्टी के दीये जलाना केवल परंपरा नहीं इसके साथ ही स्थानीय कारीगरों के हुनर को सम्मान देना भी है. दिवाली के अवसर पर लोग पूजा-पाठ के साथ घरों की सजावट के लिए भी दीये खरीदते हैं. ऐसे में स्थानीय कारीगरों से खरीदारी करके उनके परिवारों की आजीविका को सहारा दिया जा सकता है. वहीं, गाय के गोबर और मिट्टी से बने दीपक प्राकृतिक उत्पादों के प्रति लोगों की रुचि बढ़ाने में मदद कर सकते हैं. त्योहारों की असली रौनक केवल बाजारों की चमक-दमक में नहीं, बल्कि उन हाथों की मेहनत में भी छिपी है जो हर साल दिवाली को खास बनाते हैं. धनराज प्रजापत जैसे कारीगर अपनी तीन पीढ़ियों की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.
About the Authorमोनाली पाल
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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October 25, 2026, 11:42 IST



