दिवाली पर चाइनीज लाइटों ने छीनी पाली के कुम्हारों की रोजी-रोटी, 10 दिन से दुकान लगाकर बैठी महिला की बात सुनकर भर आएंगी आंखें

पाली. बदलते दौर और बाजार में आई चाइनीज लाइटिंग के चलते पुश्तैनी हुनर से जुड़े कुम्हारों के सामने आज रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है. दिन-रात चाक पर मेहनत कर हजारों दीये गढ़ने वाले ये परिवार आज ग्राहकों का इंतजार कर रहे हैं. कुम्हार परिवार दीपावली के लिए दिन-रात मेहनत कर हजारों दीये तैयार करते हैं, लेकिन बाजार में चाइनीज लाइटिंग और विदेशी सजावटी आइटम की बढ़ती लोकप्रियता के चलते पारंपरिक दीयों की बिक्री प्रभावित हो रही है.
कुम्हारों को उम्मीद है कि लोग इस बार स्वदेशी परंपरा को प्राथमिकता देंगे. उनका कहना है कि मिट्टी के दीये खरीदना केवल एक परंपरा निभाना नहीं है, बल्कि स्थानीय कारीगरों की मेहनत और उनके परिवारों की आजीविका को सहारा देना भी है.
कला, संस्कृति और हुनर के लिए पाली का देशभर में नाम
राजस्थान का पाली जिला अपनी कला, संस्कृति और हुनर के लिए पूरे देश में जाना जाता है. यहां की माटी से बने उत्पाद, जैसे सुप्रसिद्ध कुल्हड़ और अन्य बर्तन, न केवल स्थानीय बाजारों की शान बढ़ाते हैं, बल्कि अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और कलात्मकता के दम पर देश-विदेश तक अपनी विशेष पहचान रखते हैं. दीपावली के इस पावन पर्व पर जब घर-घर को रोशन करने की बात आती है, तो पाली के कुम्हारों द्वारा चाक पर गढ़े गए मिट्टी के दीयों की बात ही कुछ और होती है.
चाइनीज लाइटों की चमक में फीकी पड़ी उम्मीदेंएक तरफ जहां पाली के पारंपरिक कुल्हड़ और बर्तन ग्लोबल मार्केट तक अपनी पहुंच बना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दीपावली के इस बड़े पर्व पर मिट्टी के दीये नहीं बिकने के कारण कुम्हार समाज के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है. बाजार में आधुनिकता और चाइनीज लाइटिंग की चमक ने इन मेहनतकश परिवारों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. दिन-रात चाक पर पसीना बहाकर हजारों दीये तैयार करने वाले ये परिवार आज बाजारों में ग्राहकों का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.
दीपक बेचने वाली महिला ने बयां किया दर्ददीपक बेचने वाली रूकी देवी कहती हैं कि दुकान लगाए हुए 9-10 दिन हो गए हैं, लेकिन कोई ग्राहक ही नहीं आ रहा. लोग चाइना का सामान ज्यादा खरीदते हैं और दीपक नहीं लेते. अब क्या करें, इसमें कोई कमाई नहीं बची है. मिट्टी का सामान टूट-फूट जाता है, तो नुकसान अलग होता है. यह सब देखकर बहुत दुख होता है.
‘वोकल फॉर लोकल’ अपनाने की अपीलइस विकट परिस्थिति में जहां एक ओर निराशा है, वहीं दूसरी ओर समझदार नागरिक इन कुम्हारों के समर्थन में आगे आ रहे हैं. स्थानीय खरीदार इस स्थिति पर चिंता जताते हुए स्वदेशी अपनाने की पुरजोर वकालत कर रहे हैं. उनका कहना है कि हमें मिट्टी के दीये जरूर खरीदने चाहिए, क्योंकि यह हमारे देश के कारीगरों की बेजोड़ कलाकारी है. इसे सिर्फ कुम्हार भाई ही बना सकते हैं. चाइनीज या ऑटोमेटिक सामान से असली दीपावली नहीं मनाई जाती. असली रोशनी तो मिट्टी के दीयों से ही होती है. लोगों से अपील है कि वे स्वदेशी अपनाएं.
चाइनीज सामान का विरोध, फिर भी इस्तेमाल क्यों?
लोगों का कहना है कि हम एक तरफ तो चीन का विरोध करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उसी के बनाए दीये और अन्य सामान का इस्तेमाल करते हैं, जो हमारी संस्कृति के बिल्कुल खिलाफ है. कुम्हार समाज पीढ़ियों से इस कला को सहेजता आ रहा है. माता लक्ष्मी की तस्वीरें, सुंदर दीये और सजावट का सामान ये कारीगर कितनी मेहनत से तैयार करते हैं. मेरी सभी से गुजारिश है कि इनसे ज्यादा से ज्यादा खरीदारी करें, ताकि इनकी दिवाली भी खुशहाली से मन सके.



