बिना कारण शारीरिक संबंध नहीं बनाना मानसिक क्रूरता, तलाक पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बिना उचित कारण लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करना मानसिक क्रूरता माना जा सकता है. राजस्थान हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए ये बात कही है. ऐसी स्थिति में इसे तलाक देने का आधार बनाया जा सकता है. कोर्ट ने पति को दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखते हुए पत्नी की दोनों अपीलें खारिज कर दीं.
यह मामला 2018 में हुई एक शादी से जुड़ा है. पति बालोतरा में कुल्फी बनाने का कारोबार करता है, जबकि पत्नी जैसलमेर नगर परिषद में जूनियर अकाउंटेंट के पद पर काम करती थी. पति का आरोप था कि शादी के कुछ ही दिनों बाद दोनों के बीच रिश्ते बिगड़ गए और पत्नी ने शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर दिया. उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी उसे कुल्फी बेचने के काम को लेकर ताने देती थी और जहर खाकर जान देने की धमकी देती थी.
शादी के कुछ दिन बाद ही अलग रहने लगे थे पति-पत्नी
पति के मुताबिक, शादी के बाद पत्नी करीब 10 दिन बालोतरा में उसके साथ रही और फिर नौकरी के लिए जैसलमेर लौट गई. बाद में पति भी करीब 15 से 20 दिन उसके साथ जैसलमेर में रहा. इसी दौरान दोनों के बीच विवाद बढ़ने का दावा किया गया.
पति ने कहा कि 25 अक्टूबर 2018 के बाद उनके बीच शारीरिक संबंध नहीं बने और दोनों अलग रहने लगे. इसके बाद उसने मानसिक क्रूरता और अलग रहने के आधार पर तलाक की मांग की.
पत्नी ने पति पर लगाए अलग आरोप
पत्नी ने पति के आरोपों को खारिज किया. उसका कहना था कि पति छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करता था. उस पर नौकरी छोड़कर बालोतरा आने का दबाव बनाता था. पत्नी ने आरोप लगाया कि पति उसकी सैलरी का आधा हिस्सा भी चाहता था. वह पति के साथ रहना चाहती थी, लेकिन अपनी नौकरी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. उसने शादीशुदा जिंदगी जीवन बहाल करने की मांग भी की.
फैमिली कोर्ट ने 2024 में दिया तलाक
जैसलमेर की फैमिली कोर्ट ने 20 फरवरी 2024 को पति की याचिका स्वीकार करते हुए क्रूरता के आधार पर तलाक दे दिया. साथ ही, पत्नी की वैवाहिक जीवन बहाल कराने की याचिका भी खारिज कर दी. इसके बाद पत्नी ने फैमिली कोर्ट के फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी. उसने तलाक के आदेश के साथ-साथ वैवाहिक जीवन बहाल कराने की याचिका खारिज किए जाने के फैसले के खिलाफ भी अपील की.
हाईकोर्ट ने किन आधारों पर दिया फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित शामिल थे. उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता के पहलू पर विचार किया. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष और सोनल तलपदा बनाम वीरभान सिंह (2026) जैसे फैसलों का भी हवाला दिया. कोर्ट के अनुसार, यदि कोई पति या पत्नी बिना किसी उचित कारण के लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने से एकतरफा इनकार करता है, तो यह मानसिक क्रूरता हो सकती है.
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि पत्नी के जवाब में 25 अक्टूबर 2018 के बाद शारीरिक संबंध दोबारा शुरू होने की बात नहीं कही गई थी. रिकॉर्ड में शारीरिक अक्षमता का कोई प्रमाण भी सामने नहीं आया. आत्महत्या की धमकी से जुड़े आरोपों और साक्ष्यों पर भी विचार किया गया. सभी तथ्यों विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को बरकरार रखा और पत्नी की दोनों अपीलें खारिज कर दीं.


