भगवान महावीर को क्यों परेशान कर रहे हो? मंदिर के हक की जंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, श्वेतांबर-दिगंबर समाज में ठनी

आप उस महान संत और भगवान को क्यों परेशान कर रहे हैं, जिन्होंने इस धरती को शांति का संदेश दिया? क्या आपको लगता है कि इस बेवजह की मुकदमेबाजी और आपसी लड़ाई से भगवान महावीर प्रसन्न हो रहे होंगे? क्या आप उम्मीद करते हैं कि सुबह श्वेतांबर संप्रदाय अपने तरीके से पूजा-अर्चना करे और शाम को दिगंबर संप्रदाय भगवान के वस्त्र बदलकर अपने तरीके से अनुष्ठान करे? धर्म और धार्मिक भावनाएं बेहद संवेदनशील विषय हैं, इसलिए दोनों पक्षों को इस मुकदमेबाजी को यहीं रोक देना चाहिए. राजस्थान के प्रसिद्ध श्री महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय के बीच बरसों से चले आ रहे विवाद पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह बेहद भावुक और कड़ा संदेश दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसलाराजस्थान के करौली स्थित अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी मंदिर के प्रबंधन और अधिकारों को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. अदालत ने श्वेतांबर और दिगंबर दोनों पक्षों को अगले 8 दिनों के भीतर अपनी-अपनी लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश दिया है. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम और प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अपनी दलीलें पेश कीं.
1991 के पूजा स्थल अधिनियम पर छिड़ी कानूनी जंग
अदालत के सामने मुख्य बहस 1991 के प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट (Places of Worship Act, 1991) को लेकर हुई.• दिगंबर पक्ष की दलील: वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने तर्क दिया कि यह मामला पूजा स्थल के रूपांतरण (Conversion) का नहीं है बल्कि केवल मंदिर प्रबंधन से जुड़ा है. इसलिए इस मामले में 1991 का पूजा स्थल अधिनियम लागू नहीं होता. इसे केवल साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाना चाहिए.• श्वेतांबर पक्ष की दलील: वरिष्ठ वकील आर्यमा सुंदरम ने कहा कि निचली अदालत ने 1991 के कानून के तहत कार्यवाही खत्म कर दी थी. चूंकि 1991 के एक्ट में अपील का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है इसलिए हाईकोर्ट को यह अपील स्वीकार नहीं करनी चाहिए थी. उन्होंने कहा कि मंदिर, मूर्ति और उससे जुड़ी संपत्तियों पर ऐतिहासिक रूप से दिगंबर संप्रदाय का ही नियंत्रण रहा है.
1970 से 2026 तक: जानिए क्या है पूरा विवाद?
यह विवाद राजस्थान सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम, 1959 की धारा 40 के तहत दायर एक आवेदन से शुरू हुआ था, जिसमें दिगंबर समिति के अध्यक्ष और सचिव को हटाकर श्वेतांबर संप्रदाय की नई प्रबंधन समिति बनाने की मांग की गई थी.
• 1970: उप-खंड अधिकारी (SDO) ने दिगंबर समिति के खिलाफ एक आवेदन को मंजूरी दी थी.• 1994: ट्रायल कोर्ट ने 1991 के पूजा स्थल अधिनियम की धारा 4 के तहत कार्यवाही को रोक (Abate) दिया था.• हाईकोर्ट का फैसला: राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि ट्रस्ट अधिनियम के तहत दिया गया आदेश एक ‘डिक्री’ है, इसलिए इसके खिलाफ वैधानिक अपील की जा सकती है.• सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: हाईकोर्ट के इसी फैसले को दिगंबर समिति ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी (SLP) के जरिए चुनौती दी है, जिस पर अब फैसला आना बाकी है.
सवाल-जवाबसवाल 1: सुप्रीम कोर्ट ने श्री महावीर जी मंदिर विवाद में सुनवाई के बाद क्या आदेश दिया?जवाब: जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है और दोनों पक्षों को 8 दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है.
सवाल 2: श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय के बीच यह कानूनी विवाद किस बात को लेकर है?जवाब: यह विवाद राजस्थान के श्री महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन, ट्रस्ट के अधिकारों और पूजा-पद्धति के नियंत्रण को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय के बीच चल रहा है.
सवाल 3: सुनवाई के दौरान ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ को लेकर क्या तर्क दिए गए?जवाब: दिगंबर पक्ष ने कहा कि यह सिर्फ प्रबंधन का मामला है, इसलिए 1991 का कानून लागू नहीं होता. वहीं श्वेतांबर पक्ष का तर्क था कि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही बंद होने के बाद हाईकोर्ट में सीधी अपील पोषणीय (Maintainable) नहीं थी.
सवाल 4: सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को क्या नसीहत दी?जवाब: कोर्ट ने कहा कि धार्मिक भावनाएं संवेदनशील होती हैं और भगवान महावीर के नाम पर इस तरह की मुकदमेबाजी से भगवान प्रसन्न नहीं होंगे, इसलिए दोनों पक्षों को समझदारी से काम लेना चाहिए.



