भारत के नक्शे जैसी दिखती है भोपालगढ़ किले की चारदीवारी, सदियों पुरानी है इसकी विरासत

झुंझुनूं. जिले के खेतड़ी की पहचान केवल तांबे की खदानों और स्वामी विवेकानंद से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों तक सीमित नहीं है. अरावली की पहाड़ियों पर स्थित भोपालगढ़ किला भी यहां की गौरवशाली विरासत का अहम हिस्सा है. इस दुर्ग की सबसे खास बात इसकी चारदीवारी है, जिसे ऊंचाई से देखने पर भारत के मानचित्र जैसी आकृति दिखाई देती है. करीब 10 फीट चौड़ी चारदीवारी वाला यह किला सदियों पुराने स्थापत्य, सुरक्षा व्यवस्था और राजसी वैभव की कहानी बयां करता है.
शार्दूल सिंह के पोते राजा भोपाल सिंह ने वर्ष 1770 में इस गढ़ का निर्माण करवाया था. बाद में राजा फतेह सिंह, राजा बख्तावर सिंह, राजा बहादुर अजीत सिंह और राजा जयसिंह के समय में किले का स्वरूप विकसित हुआ. अरावली की पहाड़ी पर स्थित यह दुर्ग आज भी इतिहास और स्थापत्य में रुचि रखने वाले पर्यटकों को आकर्षित करता है.
मोती महल में राजदरबार, शीश महल में रानी निवास
भोपालगढ़ की विशेष पहचान इसके दो प्रमुख महल हैं. इनमें मोती महल का उपयोग राजदरबार के लिए किया जाता था, जबकि शीश महल का निर्माण रानी के निवास के रूप में करवाया गया था. किले में खुले द्वार, स्तंभों वाले कमरे और पुराने भवनों के अवशेष आज भी इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाते हैं. गढ़ परिसर में गोपीनाथजी मंदिर, दुर्गा मंदिर, पंचमुखी महादेव मंदिर, संतोषी माता मंदिर और चुड़ावत सती मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी हैं. गोमुख वाला तालाब यहां के दर्शनीय स्थलों में शामिल है. इन स्थलों के कारण भोपालगढ़ केवल ऐतिहासिक दुर्ग ही नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और स्थानीय संस्कृति से जुड़ा केंद्र भी है.
तीन तोपों के ठिकाने और पांच निगरानी मीनारेंकिले की सुरक्षा व्यवस्था अपने समय की सैन्य तैयारियों की झलक दिखाती है. दुर्ग में तीन तोपें रखने के स्थान बनाए गए थे, जिन्हें बुढ़िया तोप, बिच्छन तोप और लक्ष्मण तोप के नाम से जाना जाता है. निगरानी के लिए पांच बड़ी वॉचिंग मीनारें भी बनाई गई थीं.किले में कुएं और वर्षा जल संग्रह के लिए भूमिगत भंडारण की व्यवस्थाएं मौजूद थीं. ये संरचनाएं बताती हैं कि उस दौर में सुरक्षा के साथ-साथ पानी के संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाता था. विभिन्न राजकर्मियों के निवास के लिए बने भवनों के अवशेष भी यहां के पुराने वैभव की गवाही देते हैं.
हवा महल की डिजाइन से भी जुड़ता है इतिहास
भोपालगढ़ की स्थापत्य शैली को लेकर एक ऐतिहासिक मान्यता यह भी है कि जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने वर्ष 1799 में हवा महल का निर्माण करवाते समय इस गढ़ की डिजाइन से प्रेरणा ली थी. यह प्रसंग भोपालगढ़ की वास्तुकला को लेकर लोगों की जिज्ञासा बढ़ाता है. हालांकि, इस संबंध की पुष्टि के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों का संदर्भ महत्वपूर्ण होगा.
तांबे की खदानों से मिली खेतड़ी को अलग पहचानखेतड़ी की पहचान में तांबे की खदानों की भी अहम भूमिका रही है. तांबा खनन ने इस क्षेत्र को देशभर में पहचान दिलाई. खदानों को आम पर्यटक सामान्य रूप से नहीं देख सकते, लेकिन खनन से जुड़ी विरासत को पर्यटन से जोड़ने की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं. यदि यहां कॉपर माइनिंग की जानकारी देने वाला पर्यटन केंद्र या खनन इतिहास पर आधारित कोई साइट विकसित की जाए, तो पर्यटकों को क्षेत्र की औद्योगिक विरासत समझने का अवसर मिल सकता है. इससे स्थानीय पर्यटन और रोजगार को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है. क्षेत्र में संरक्षण से जुड़ी पहल भी इस दिशा में उपयोगी हो सकती है.
500 मीटर ऊंचे मोती महल पर बेटियों ने फहराया तिरंगाभोपालगढ़ का संबंध केवल इतिहास और स्थापत्य से ही नहीं, बल्कि देशभक्ति की भावना से भी जुड़ा है. स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर भास्कर के आह्वान पर खेतड़ी की युवतियों रेनू, आरती, ज्योति, प्रिया और भव्या सहित अन्य युवाओं ने किले में स्थित मोती महल की छत पर तिरंगा फहराया था. इस पहल के माध्यम से युवाओं ने देशभक्ति और लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्प का संदेश दिया. उनका संदेश था कि मुश्किल परिस्थितियों में धैर्य और हौसले के साथ आगे बढ़ा जाए, तो सफलता की राह बनाई जा सकती है. खेतड़ी का भोपालगढ़ इतिहास, स्थापत्य, जल संरक्षण, धार्मिक आस्था और देशभक्ति का ऐसा संगम है, जिसे संरक्षित कर पर्यटन के नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं. देश के नक्शे जैसी दिखाई देने वाली इसकी चारदीवारी इस ऐतिहासिक धरोहर को एक अलग पहचान देती है.



