मोबाइल ने छीनी किताबों से दूरी? बच्चों में घट रही एकाग्रता, पढ़ाई के दबाव को लेकर एक्सपर्ट ने क्या कहा?

Last Updated:September 12, 2026, 20:51 IST
Pali News : स्कूली बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य चुनौती बना. जोधपुर के शिक्षाविदों ने स्क्रीन टाइम, किताबों से दूरी और अभिभावकों की अपेक्षाओं को तनाव का कारण बताया. बच्चा घर आते ही मोबाइल या लैपटॉप पर जानकारी ढूंढने लगता है. जबकि वास्तविक और संपूर्ण ज्ञान पुस्तकों में ही मिलता है.
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पाली. आज के डिजिटल दौर में स्कूली बच्चों की शिक्षा और उनका मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. एकाग्रता में कमी, स्क्रीन टाइम की अधिकता, पुस्तकों से दूरी और अभिभावकों की बेतहाशा अपेक्षाएं बच्चों को तनाव की ओर धकेल रही हैं. इस गंभीर विषय पर जोधपुर के वरिष्ठ शिक्षाविदों, सेवानिवृत्त अधिकारियों और अभिभावकों ने अपने विचार साझा किए तथा इस समस्या के समाधान के रास्ते बताए.
विशेषज्ञों के अनुसार, कोविड काल के बाद से ऑनलाइन कक्षाओं की जो आदत बनी, उसने बच्चों को किताबों से दूर कर दिया है. अब विद्यार्थी किसी भी विषय की गहराई में जाने के बजाय इंटरनेट और मोबाइल पर त्वरित समाधान तलाशते हैं. इससे उनकी पढ़ने की आदत (रीडिंग हैबिट) प्रभावित हुई है और कक्षाओं में एकाग्रता का स्तर लगातार घटा है. कमजोर विद्यार्थियों को मुख्यधारा में लाना और उनके अंदर पढ़ाई के प्रति रुचि जगाना आज के शिक्षकों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है.
लक्ष्य का दबाव इतना हावी कि स्थिति अनुकूल न होने पर टूट जाते हैं बच्चेसेवानिवृत्त जिला शिक्षा अधिकारी विद्योत्तमा वर्मा ने कहा कि पहले गुरु का अपार सम्मान था और विद्यार्थी उनकी बात मानते थे. आज विद्यार्थियों की मानसिकता बदल चुकी है. परीक्षा उत्तीर्ण करने और लक्ष्य पाने का दबाव इतना हावी हो जाता है कि स्थितियां अनुकूल न होने पर बच्चे आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं. शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों को समझें, साहस दें और सही दिशा दिखाएं. लेकिन शिक्षक से पहले माता-पिता की भूमिका आती है. यदि घर में शुरुआत से अनुशासन रहेगा, तभी शिक्षक की बात भी प्रभावी होगी. साथ ही शिक्षकों को भी अपने आचरण से उदाहरण पेश करना होगा.
ऑनलाइन पर निर्भरता ने किताबों का रुझान कम कियासेवानिवृत्त प्रधानाचार्य चंदा मैढ़ ने कहा कि कोरोना काल में ऑनलाइन कक्षाएं मजबूरी थीं, जो अब बच्चों की आदत बन चुकी हैं. बच्चा घर आते ही मोबाइल या लैपटॉप पर जानकारी ढूंढने लगता है. जबकि वास्तविक और संपूर्ण ज्ञान पुस्तकों में ही मिलता है. यदि शिक्षक कक्षा में ही विषय की संपूर्ण जानकारी देकर बच्चे की हर जिज्ञासा और समस्या का समाधान कर दें, तो बच्चों में यह विश्वास जागेगा कि शिक्षक जो बता रहे हैं, वही सही है. इससे उनकी इंटरनेट पर निर्भरता कम होगी और किताबों की तरफ रुझान बढ़ेगा.
अभिभावक अपनी इच्छा थोपने के बजाय बच्चे की रुचि और योग्यता पहचानेंअभिभावक और सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी प्रवीण मैढ़ ने कहा कि आज शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी तीनों के बीच संवाद कम हो गया है. महंगाई के दौर में परिवार चलाना और उच्च शिक्षा, जैसे 50 लाख रुपये तक की इंजीनियरिंग फीस, का खर्च उठाना आम व्यक्ति के लिए चिंता का विषय है. सबसे जरूरी बात यह है कि अभिभावक अपनी इच्छाएं बच्चों पर न थोपें. यदि माता-पिता डॉक्टर हैं, तो जरूरी नहीं कि बच्चा भी डॉक्टर बने. हो सकता है उसकी रुचि और योग्यता प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में हो. बच्चे की रुचि के अनुसार ही उसे मार्गदर्शन मिलना चाहिए. शिक्षकों को भी सभी विद्यार्थियों को अपने बच्चों जैसा स्नेह और सम्मान देना होगा.
अपेक्षाओं के बोझ तले हताश हो रहे हैं बच्चेअभिभावक एवं सेवानिवृत्त अध्यापिका कमला मोहनोत ने कहा कि आजकल बच्चों पर परिवारजनों ने अपेक्षाओं का अत्यधिक बोझ डाल रखा है. अत्यधिक दबाव के कारण स्थिति यह हो जाती है कि बच्चे न तो शिक्षकों की सुनते हैं और न ही परिवार की. जब पढ़ाई को ज्ञान के बजाय केवल एक बोझ के रूप में लिया जाता है, तो बच्चे हताश और निराश होने लगते हैं. इस बोझ को हल्का करना बेहद जरूरी है.
About the Authorआनंद पाण्डेयContent Producer
आनंद पाण्डेय वर्तमान में हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अ…
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First Published :
September 12, 2026, 20:51 IST



