राजस्थान के 900 साल पुराने इस शक्तिपीठ में निभाई जाती हैं अनोखी परंपराएं, जानिए मां कैलादेवी के दरबार की महिमा

करौली. राजस्थान के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल कैलादेवी धाम आस्था, परंपरा और भक्ति का बड़ा केंद्र है. करौली जिला मुख्यालय से करीब 23 किलोमीटर दूर अरावली पर्वतमाला के त्रिकूट पर्वत पर स्थित मां कैलादेवी के मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है. चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं, इनमें चैत्र लक्खी मेला सबसे प्रमुख है. इस दौरान राजस्थान के साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और गुजरात सहित देश के कई राज्यों से लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मेले में उमड़ने वाली भीड़, धार्मिक अनुष्ठानों और भक्ति गीतों के बीच पूरे क्षेत्र में लघुकुंभ जैसा नजारा दिखाई देता है.
कैलादेवी मंदिर का इतिहास 900 साल से अधिक पुराना माना जाता है, इतिहासकारों के अनुसार, वर्ष 1114 ईस्वी में महात्मा केदार गिरि ने मां कैलादेवी की प्रतिमा स्थापित की थी. इसके दो साल बाद, 1116 ईस्वी में तत्कालीन खींची शासक मुकुंद दास ने यहां एक छोटे मंदिर का निर्माण कराया. वर्ष 1753 में राजा गोपाल सिंह ने मंदिर का विस्तार कराया. मंदिर में मां कैलादेवी के साथ मां चामुंडा की प्रतिमा भी विराजमान है, दोनों देवियों के दर्शन के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं.
नवरात्रि में विशेष पूजा और शृंगार की परंपरा
कैलादेवी मंदिर में नवरात्रि के दौरान पूजा-अर्चना और शृंगार का विशेष महत्व है. चैत्र नवरात्रि में घट स्थापना के समय माता को विशेष पोशाक और पुराने आभूषण धारण कराने की परंपरा निभाई जाती है. मान्यता के अनुसार, घट स्थापना से अष्टमी पूजन तक माता के वस्त्र और शृंगार नहीं बदले जाते. अष्टमी की पूजा के बाद माता को नई पोशाक धारण कराई जाती है. इन दिनों श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं. मंदिर में दर्शन करने के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं.
शादी, जन्म और मुंडन से जुड़ी हैं मान्यताएं
कैलादेवी मंदिर की आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां कई पारिवारिक परंपराएं भी निभाई जाती हैं. मान्यता है कि बेटे के विवाह और बच्चे के जन्म के बाद परिवार माता के दरबार में पहुंचकर धोक लगाता है. नवविवाहित जोड़े माता के दर्शन कर सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं. वहीं, बच्चों का पहला मुंडन संस्कार कराने के लिए भी बड़ी संख्या में परिवार यहां आते हैं. इन परंपराओं के कारण मेले का धार्मिक महत्व पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना हुआ है.
लांगुरिया गीतों से गूंजता है कैलादेवी धाम
कैलादेवी मेले की पहचान यहां गाए जाने वाले लांगुरिया गीत भी हैं, मेले के दौरान मंदिर परिसर और आसपास के कस्बे में ढोल-नगाड़ों के साथ भक्ति गीतों की गूंज सुनाई देती है. महिला और पुरुष श्रद्धालु इन गीतों पर नृत्य करते हुए माता के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, भैरव को माता का भक्त लांगुरिया कहा जाता है. माता के दर्शन के बाद लांगुरिया पूजन की परंपरा भी निभाई जाती है. मंदिर परिसर में बोहरा भगत का मंदिर भी स्थित है, श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि बोहरा भगत के दर्शन के बिना कैलादेवी की यात्रा अधूरी रहती है. चैत्र लक्खी मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने को देखते हुए कैलादेवी कस्बे में ठहरने की व्यवस्था भी विकसित हुई है। यहां 600 से अधिक धर्मशालाएं बनी हुई हैं. इनमें से अधिकांश का निर्माण भक्तों ने यात्रियों की सुविधा के लिए कराया है, मेले के दौरान इन धर्मशालाओं में दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु ठहरते हैं. चैत्र मेले के दौरान उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ और चारों ओर दिखाई देने वाली धार्मिक गतिविधियां कैलादेवी को राजस्थान के प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल करती हैं.



