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राजस्थान में निर्दलियों की तो मौज! 2,273 सीटों पर कब्जा कर बने बड़का नेता, कुर्सी चाहिए तो जोड़ें इनके हाथ-पैर, समझिए पूरा सियासी समीकरण

rajasthan nikay chunav result 2026: राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के नतीजों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही. लेकिन चुनाव का एक और नतीजा इस बार बेहद खास रहा है. इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2,273 वार्डों में जीत दर्ज कर अपनी मजबूत मौजूदगी पूरे राज्य मे करा दी है. कई नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. ऐसे में बोर्ड गठन के दौरान निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बढ़ गई है. कहीं ये किंगमेकर बन सकते हैं, तो कहीं इनका समर्थन सत्ता की कुर्सी का रास्ता तय कर सकता है. तो देर किस बात की जान लेते हैं पूरी कहानी.

22 फीसदी सीटें निर्दलीयों के नाम

मीडिया में छपी रिपोर्ट के मुता‌बिक, 10,244 वार्डों के अंतिम आंकड़ों को देखें तो बीजेपी के खाते में कुल सीटों की संख्या देखें  40.79 फीसदी वार्डों पर जीत मिली है. कांग्रेस की हिस्सेदारी इसमें करीब 35.27 फीसदी रही. वहीं निर्दलीयों ने 22.19 फीसदी वार्डों पर जीत दर्ज की. ध्यान रहे कि ये आंकड़े सीटों के प्रतिशत हैं, वोट शेयर नहीं. यानी हर पांच में करीब एक वार्ड में निर्दलीय उम्मीदवार जीतकर आए हैं.

बीजेपी नंबर वन, कांग्रेस दूसरे नंबर पर

बीजेपी ने 4,179 सीटें जीतकर सबसे बड़ा आंकड़ा हासिल किया है. कांग्रेस 3,613 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है. दोनों के बीच 566 सीटों का अंतर है. इसके बाद निर्दलीय 2,273 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर हैं. यानी पार्टियों की बात छोड़ दें तो निर्दलीय उम्मीदवारों ने अपने दम पर इतना बड़ा आंकड़ा खड़ा किया है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.

राजस्थान में निर्दलीय कितनी जगह बने किंगमेकर?

नगर निगम (Municipal Corporations): जोधपुर से भरतपुर तक त्रिशंकु मुकाबला

स्पष्ट बहुमत का अभाव: राज्य के 10 नगर निगमों में से आधे यानी 5 निगमों (जोधपुर, अजमेर, पाली, भरतपुर और अलवर) में किसी भी प्रमुख दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, जिससे बोर्ड गठन के लिए निर्दलियों का समर्थन अनिवार्य हो गया है.जोधपुर में कांटे की टक्कर: जोधपुर नगर निगम में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने 44-44 सीटें जीतकर बराबरी का मुकाबला खड़ा कर दिया है, जहाँ मेयर की कुर्सी का फैसला पूरी तरह वहां के निर्दलीय पार्षदों के पाले में चला गया है.भरतपुर, पाली, अजमेर और अलवर: इन निगमों में भी निर्दलीय और बागी उम्मीदवार ही असली ताकत बनकर उभरे हैं, जिनके बिना कोई भी दल मेयर की कुर्सी हासिल नहीं कर सकता.

2. नगर परिषद (Municipal Councils): 21 परिषदों में फंसा पेंच

सत्ता की चाबी निर्दलियों के पास: राज्य कुल 47 नगर परिषदों में बंटी हुई है, जिनमें से लगभग 21 परिषदें ऐसी हैं जहां त्रिशंकु स्थिति (Hung House) बनी हुई है. यहां किसी भी राजनीतिक दल के पास अपने दम पर चेयरमैन बनाने का जादुई आंकड़ा नहीं है, जिसके कारण निर्दलीय पार्षद ही इन शहरी निकायों की सरकार के असली ‘निर्णायक’ बने हुए हैं.

3. नगर पालिकाएं (Municipalities): 121 पालिकाओं में सबसे बड़ी और निर्णायक भूमिका

सबसे बड़ा खेल ग्रामीण-शहरी सीमांत क्षेत्रों में: कुल 252 नगर पालिकाओं में से आधे से ज्यादा यानी 121 पालिकाएं ऐसी हैं, जहां राजनीतिक दलों के समीकरण फेल हो गए हैं. इन 121 पालिकाओं में निर्दलीय और अन्य छोटे दल बोर्ड के गठन में सबसे मजबूत स्थिति में हैं और अध्यक्ष (चेयरमैन) पद के चुनाव में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता.

अब थोड़ा नगर निगम के खेल को गहरे से समझें

भरतपुर में निर्दलीयों का सबसे बड़ा खेल: नगर निगमों की तस्वीर देखें तो भरतपुर सबसे ज्यादा चौंकाता है. यहां कुल 65 वार्डों में निर्दलीयों ने 36 सीटें जीत लीं हैं. बीजेपी को 20 और कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें मिलीं. यानी इस निगम में निर्दलीय सबसे बड़ा ग्रुप बनकर सामने आए हैं. बोर्ड गठन के समय यहां उनकी भूमिका बेहद अहम रहने वाली है.

अजमेर से पाली तक असर: अजमेर नगर निगम में कांग्रेस 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, बीजेपी को 32 और निर्दलीयों को 11 सीटें मिलीं. अलवर में बीजेपी 28, कांग्रेस 23 और निर्दलीय 13 सीटों पर रहे. पाली में कांग्रेस 29, बीजेपी 21 और निर्दलीय 15 सीटों पर जीते. इन आंकड़ों से साफ है कि कई शहरों में निर्दलीय कोई छोटा खिलाड़ी नहीं हैं.

जोधपुर में भी फंसा सियासी पेंच: जोधपुर नगर निगम में मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी और कांग्रेस दोनों 44-44 सीटों पर हैं, जबकि 10 सीटें निर्दलीयों के खाते में गई हैं. ऐसे समीकरण में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका अचानक काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. यही वजह है कि चुनाव परिणाम आने के बाद अब नजर बोर्ड गठन के अगले कदम पर है.

बाकी दलों का आंकड़ा काफी छोटा

निर्दलीयों के बाद बाकी पार्टियां काफी पीछे हैं. राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी यानी RLP ने 63 सीटें जीती हैं. आम आदमी पार्टी को 42, CPIM को 38, BSP को 19 और भारत आदिवासी पार्टी यानी BAP को 8 सीटें मिली हैं. नेशनल पीपुल्स पार्टी यानी NPP अपना खाता भी नहीं खोल सकी.

अब किसके साथ जाएंगे निर्दलीय?

निकाय चुनाव का नतीजा आने के बाद अगली चुनौती बोर्ड बनाने की है. जहां किसी पार्टी को साफ बहुमत नहीं मिला है, वहां निर्दलीय पार्षदों का समर्थन समीकरण बदल सकता है. भरतपुर में तो निर्दलीय खुद सबसे बड़े समूह के रूप में सामने आए हैं. बाकी कई निगमों में भी उनकी संख्या इतनी है कि वे सत्ता की दिशा तय करने में भूमिका निभा सकते हैं. कुल मिलाकर राजस्थान निकाय चुनाव में बीजेपी ने सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं और कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही है. लेकिन 2,273 सीटों के साथ निर्दलीयों ने भी अपनी ताकत का एहसास करा दिया है. अब देखना होगा कि ये ‘बड़का नेता’ किसके साथ जाते हैं और कितने नगर निकायों में कुर्सी की चाबी इनके हाथ में आती है. क्योंकि इनका असर यानी यह असर सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे कस्बों और नगर पालिकाओं तक भी दिखाई दे रहा है.

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