रोहित शर्मा से टकराव और वीवीएस लक्ष्मण से मतभेद, ऐसे बिछी अजीत अगरकर की विदाई की बिसात

नई दिल्ली. भारतीय क्रिकेट में चयन समिति के अध्यक्ष का पद हमेशा से ही चुनौतियों और विवादों से भरा रहा है. यहां भविष्य की दूरगामी योजनाओं और वर्तमान के सुपरस्टार्स के रसूख के बीच अक्सर सीधा टकराव देखने को मिलता है. अजीत अगरकर की मुख्य चयनकर्ता के पद से विदाई भी इसी कड़वे सच का एक जीता-जागता प्रमाण बन गई है. यह केवल एक सामान्य इस्तीफा नहीं है, बल्कि भारतीय क्रिकेट के गलियारों में चलने वाली उस सत्ता की लड़ाई की कहानी है, जहां एक दूरदर्शी चयनकर्ता को व्यवस्था और खिलाड़ी के भारी-भरकम कद के आगे घुटने टेकने पड़े. इस पूरे घटनाक्रम ने अगरकर को बीसीसीआई के रवैये से नाराज और खुद को बेहद अपमानित महसूस करने पर मजबूर कर दिया.
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बड़े विवाद की जड़ें आगामी 2027 वनडे विश्व कप (2027 ODI World Cup) की रूपरेखा में छिपी थीं. अजीत अगरकर (Ajit Agarkar) भारतीय क्रिकेट के भविष्य को लेकर एक स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ रहे थे. उनका तार्किक सोचना था कि 2027 के विश्व कप तक वर्तमान कप्तान रोहित शर्मा (Rohit Sharma) 40 वर्ष के हो जाएंगे. ऐसे में एक ही खिलाड़ी पर इतने लंबे समय तक निर्भर रहना भविष्य की टीम के हित में नहीं होगा. अगरकर का विजन था कि युवा और आक्रामक बल्लेबाज यशस्वी जायसवाल (Yashasvi Jaiswal) को रोहित के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया जाए. वह चाहते थे कि इस बड़े टूर्नामेंट से पहले जायसवाल को वनडे क्रिकेट में खुद को साबित करने और अपनी जगह पक्की करने के लिए कम से कम 20 मैचों का भरपूर मौका मिले.
रोहित से आगे बढ़ने का कड़ा फैसलाइंग्लैंड के खिलाफ तीन मैचों की वनडे सीरीज से ठीक पहले, अगरकर ने अपना मन बना लिया था कि अब रोहित से आगे सोचने का समय आ गया है. इस कड़े और जोखिम भरे फैसले में उन्हें भारतीय टीम प्रबंधन के साथ-साथ बीसीसीआई (BCCI) के कुछ प्रभावशाली अधिकारियों का भी मौन समर्थन प्राप्त था. अब सबसे बड़ी चुनौती इस फैसले को रोहित तक पहुंचाना था. इसके लिए दक्षिण क्षेत्र के चयनकर्ता प्रज्ञान ओझा को चुना गया, जो रोहित शर्मा के बहुत अच्छे दोस्त माने जाते हैं. ओझा को यह मुश्किल जिम्मेदारी दी गई कि वह इस दिग्गज खिलाड़ी को चयनकर्ताओं की भविष्य की योजनाओं से अवगत कराएं.
नाराज रोहित का ‘शक्तिशाली प्रशासक’ से संपर्कहालांकि, भारतीय क्रिकेट के एक मेगास्टार को दरकिनार करना इतना आसान नहीं था. रोहित शर्मा इस फैसले से और जिस तरीके से चयनकर्ताओं द्वारा उनके साथ व्यवहार किया जा रहा था, उससे बिल्कुल भी खुश नहीं थे. उन्हें यह कदम अपने विशाल करियर और योगदान के प्रति अपमानजनक लगा. हार मानने के बजाय, रोहित ने एक अलग रास्ता अपनाया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने चयन समिति के फैसले को पलटवाने के लिए बीसीसीआई के ‘एक बेहद शक्तिशाली प्रशासक’ से सीधा संपर्क साधा. यहीं से यह पूरा मामला चयन समिति के हाथ से निकलकर बोर्ड की राजनीति का हिस्सा बन गया.
बीसीसीआई सचिव का बयान और अगरकर को झटकाइस अंदरूनी रस्साकशी का सबसे बड़ा धमाका तब हुआ, जब इंग्लैंड के खिलाफ ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान पर होने वाले अंतिम वनडे मैच से ठीक पहले बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया (Devajit Saikia) ने एक सार्वजनिक बयान जारी कर दिया. सैकिया का यह बयान आगरकर की सत्ता पर एक सीधा प्रहार था. उन्होंने सार्वजनिक रूप से रोहित का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया कि मीडिया में रोहित के भविष्य को लेकर चल रही सभी अटकलें बेबुनियाद हैं. सैकिया ने दृढ़ता से कहा कि ऐसा कोई विचार-विमर्श नहीं हुआ है कि लॉर्ड्स का मैच रोहित का आखिरी मैच होगा. उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि रोहित वनडे टीम के नियमित सदस्य हैं और जब तक वह टीम की योजनाओं का हिस्सा हैं, तब तक बेझिझक देश का प्रतिनिधित्व करते रहेंगे.
लॉर्ड्स में शतक और अधिकारों का एहसासयह सार्वजनिक बयान आगरकर के लिए एक बड़ा झटका था, जिसने उन्हें यह महसूस कराया कि उनके अधिकारों को किस तरह कुचला गया है. रही-सही कसर लॉर्ड्स के मैदान पर पूरी हो गई. हालांकि भारत वह मैच हार गया, लेकिन रोहित शर्मा ने एक शानदार शतक जड़कर आलोचकों का मुंह पूरी तरह से बंद कर दिया. इस शतक और बोर्ड के रवैये ने अगरकर को सच्चाई का आईना दिखा दिया. उन्हें यह एहसास हो गया कि उनके पास रोहित जैसे बड़े सितारों को टीम से बाहर करने की न तो ताकत है और न ही अधिकार. इस घटना के बाद आगरकर के लिए चयनकर्ता के पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं बचा था.
वीवीएस लक्ष्मण के साथ नीतियों पर मतभेदअगरकर की राह के कांटे केवल रोहित शर्मा तक ही सीमित नहीं थे. उनका राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (NCA) और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के प्रमुख वीवीएस लक्ष्मण के साथ भी लगातार टकराव चल रहा था. इन दोनों दिग्गजों के बीच चोटिल खिलाड़ियों के प्रबंधन और ‘इंडिया ए’ टीम के कार्यक्रमों को लेकर गहरे मतभेद थे. लक्ष्मण की कार्यशैली हमेशा से एक मजबूत टीम मैदान में उतारने की रही है, और वह चाहते थे कि हर दौरे पर सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध खिलाड़ी जाएं. इसके विपरीत, अगरकर ने एशियाई खेलों जैसे टूर्नामेंट में भारत की पहली पसंद वाली मजबूत टीम भेजने की जरूरत पर ही सवालिया निशान खड़े कर दिए थे.
शेड्यूलिंग विवाद और गहराता आपसी अविश्वास‘इंडिया ए’ के मैचों, अहम ईरानी कप और भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के बीच तारीखों के टकराव ने आगरकर और लक्ष्मण के बीच की खाई को और भी चौड़ा कर दिया. इसके अलावा, केंद्रीय अनुबंध वाले चोटिल खिलाड़ियों की मैदान पर वापसी की कोई स्पष्ट समय सीमा न होने को लेकर भी दोनों के बीच तीखी बहस हुई. आगरकर ने सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की कार्यप्रणाली की भी कड़ी आलोचना की, जिसने धीरे-धीरे एक गहरे ‘आपसी अविश्वास’ का रूप ले लिया. अंततः, अधिकारहीनता की भावना, सुपरस्टार कल्चर और व्यवस्थागत टकराव ने मिलकर अजीत अगरकर की विदाई की वह पटकथा लिख दी, जो भारतीय क्रिकेट में एक लंबे समय तक याद रखी जाएगी.



