शिक्षक हो तो ऐसा, खुद की सैलरी से शुरू किया स्कूल का कायाकल्प, फिर जुड़ा पूरा गांव और बदल गई तस्वीर

झुंझुनूं. ‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल, लोग आते गए और कारवां बनता गया…’ मंड्रेला के लाठ राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के व्याख्याता वीरेंद्र सिंह निर्वाण की कहानी इन पंक्तियों को चरितार्थ करती है. वर्ष 2011 में जब वे विद्यालय में आए, तब स्कूल में सुविधाओं की कमी थी. उन्होंने हालात बदलने का सपना देखा, लेकिन इसके लिए किसी का इंतजार नहीं किया. अपने वेतन से पैसा खर्च कर स्कूल की तस्वीर बदलने की शुरुआत की. उनके इस जुनून को देखकर साथी शिक्षक, ग्रामीण, भामाशाह और ग्राम पंचायत भी साथ जुड़ते गए. धीरे-धीरे एक शिक्षक की पहल जनभागीदारी की मुहिम बन गई. नतीजा यह रहा कि करीब 13 साल में विद्यालय में तीन करोड़ रुपए से अधिक के विकास कार्य हुए. आज यहां स्मार्ट क्लासरूम से लेकर पुस्तकालय, खेल मैदान और छात्राओं के लिए ओपन जिम तक की सुविधाएं उपलब्ध हैं.
ग्रामीणों के मुताबिक वर्ष 2011 तक विद्यालय की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. विद्यार्थियों के लिए आधुनिक सुविधाओं की कमी थी. जुलाई 2011 में सूरजगढ़ से स्थानांतरित होकर आए व्याख्याता वीरेंद्र सिंह निर्वाण ने विद्यालय की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने का संकल्प लिया. उन्होंने स्कूल स्टाफ और ग्रामीणों से चर्चा की, लेकिन बदलाव की शुरुआत दूसरों के भरोसे नहीं छोड़ी. उन्होंने सबसे पहले अपने वेतन से पैसा खर्च कर विद्यालय में सुधार के काम शुरू करवाए. एक शिक्षक को अपनी कमाई का पैसा स्कूल की बेहतरी के लिए खर्च करते देख साथी शिक्षकों और कस्बेवासियों का भी उत्साह बढ़ा. लोग अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करने लगे. इसके बाद भामाशाहों ने विकास कार्यों में आर्थिक मदद दी और ग्राम पंचायत भी इस मुहिम में शामिल हो गई. व्याख्याता वीरेंद्र सिंह निर्वाण के प्रयास ने पूरे कस्बे को विद्यालय के विकास से जोड़ दिया. समय के साथ सहयोग का दायरा बढ़ता गया और स्कूल में एक के बाद एक सुविधाएं विकसित होती चली गई.
मां सरस्वती की प्रतिमा से शुरू हुआ बदलाव
विद्यालय के विकास की शुरुआत मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करने से हुई. इसके बाद विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक माहौल उपलब्ध करवाने के लिए फर्नीचर की व्यवस्था की गई. बिजली की फिटिंग सुधारी गई और कक्षाओं के इंटीरियर में बदलाव किया गया. पढ़ाई को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए दो स्मार्ट क्लासरूम तैयार करवाए गए. विद्यार्थियों में पढ़ने की आदत विकसित करने के उद्देश्य से पुस्तकालय की व्यवस्था की गई. इन बदलावों से विद्यालय में पढ़ाई का माहौल बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए. धीरे-धीरे स्कूल की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकास कार्यों का दायरा बढ़ता गया. अब विद्यालय केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विद्यार्थियों की अन्य आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखकर सुविधाएं विकसित की जाने लगी.
चारदीवारी, पेयजल और अलग शौचालयों की व्यवस्था की गई
किसी भी विद्यालय में पढ़ाई के अच्छे माहौल के लिए बुनियादी सुविधाएं जरूरी होती है. इसे ध्यान में रखते हुए स्कूल में चारदीवारी का निर्माण करवाया गया. विद्यार्थियों के लिए पेयजल की बेहतर व्यवस्था की गई और पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए बोरिंग भी करवाई गई. बच्चों और स्टाफ के लिए अलग-अलग शौचालय बनवाए गए. इन सुविधाओं से विद्यालय की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने में मदद मिली. स्कूल में कार्यक्रम आयोजित करने के लिए अपना टेंट, साउंड सिस्टम और जनरेटर भी उपलब्ध करवाया गया. विद्यालय के नए प्रवेश द्वार का निर्माण, इंटरलॉकिंग सड़क और टाइल्स लगाने जैसे काम भी करवाए गए. स्कूल भवन के गुंबद पर एलईडी लाइट लगाई गई, जिससे रात के समय परिसर की सुंदरता और बढ़ गई.
पढ़ाई के साथ खेल और छात्राओं की सुविधाओं पर भी ध्यान
वीरेंद्र सिंह निर्वाण की पहल में केवल भवन निर्माण और कक्षाओं को बेहतर बनाने तक ही ध्यान नहीं दिया गया, बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को भी महत्व दिया गया. विद्यालय में खेल मैदान तैयार करवाया गया. मैदान की लेवलिंग के साथ पैवेलियन और बैठने के लिए सीमेंटेड बेंच बनवाई गई. छात्राओं के लिए ओपन जिम की व्यवस्था की गई, ताकि उन्हें शारीरिक गतिविधियों के लिए भी बेहतर सुविधाएं मिल सके. इन विकास कार्यों से विद्यालय का स्वरूप बदलता गया. आज स्कूल में ऐसी कई सुविधाएं मौजूद हैं, जो विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ खेलकूद और दूसरी गतिविधियों में भाग लेने के अवसर उपलब्ध करवाती है.
कोरोना काल में घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाया
वीरेंद्र सिंह निर्वाण का शिक्षा के प्रति समर्पण केवल स्कूल के विकास कार्यों तक सीमित नहीं रहा. कोरोना काल में जब नियमित कक्षाएं संचालित करना चुनौतीपूर्ण हो गया था, तब उन्होंने घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाया. यह प्रयास बताता है कि उनके लिए विद्यालय का विकास केवल भवन और संसाधन जुटाने तक सीमित नहीं था. विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रहे और वे शिक्षा से जुड़े रहें, इसके लिए भी उन्होंने प्रयास किए. विद्यालय के विद्यार्थियों का कहना है कि वीरेंद्र सिंह निर्वाण के आने के बाद स्कूल का कायाकल्प हुआ है. सुविधाओं में हुए बदलाव से पढ़ाई का माहौल बेहतर हुआ है और विद्यालय की पहचान भी बदली है.
प्रिंसिपल बोले- इच्छाशक्ति हो तो बदलाव संभव
विद्यालय के प्रिंसिपल इंद्राज मीणा ने बताया कि व्याख्याता वीरेंद्र सिंह निर्वाण के जुनून और कर्मठता ने साबित किया है कि किसी काम को करने की दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो मेहनत और समर्पण से बड़ा परिवर्तन संभव है. उनकी पहल से स्कूल स्टाफ, कस्बेवासी, भामाशाह और ग्राम पंचायत विद्यालय के विकास में सहभागी बने. सभी के सहयोग से स्कूल में बड़े स्तर पर विकास कार्य करवाए गए. करीब 13 साल की यह यात्रा बताती है कि बदलाव की शुरुआत करने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती. कई बार एक व्यक्ति का संकल्प ही दूसरों को आगे आने की प्रेरणा देता है. वीरेंद्र सिंह निर्वाण ने अपने वेतन से शुरुआत की और लोगों को इस मुहिम से जोड़ते चले गए. आज लाठ राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में तीन करोड़ रुपए से अधिक के विकास कार्यों के पीछे शिक्षक की मेहनत के साथ ग्रामीणों, भामाशाहों, स्कूल स्टाफ और ग्राम पंचायत का सामूहिक सहयोग भी है. यह कहानी उन सरकारी विद्यालयों के लिए प्रेरणा है, जहां बेहतर सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रयास किए जा रहे हैं.



