सोजत के टांके में मिला ‘मारवाड़ का चींटीखोर’, देखते ही चौंक गए लोग, स्नेक कैचर ने ऐसे किया रेस्क्यू

पाली. भारत में विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुका एक दुर्लभ पैंगोलिन सोजत में पानी के टांके में मिला है. ‘मारवाड़ का चींटीखोर’ कहलाने वाले इस खास जीव को स्नेक कैचर ने सुरक्षित बाहर निकालकर वन विभाग को सौंप दिया है. स्नेक कैचर अजय कुमार ने इसको काफी मशक्कत के बाद सुरक्षित बाहर निकालने का काम किया. जिसके बाद सुरक्षित वन विभाग को सौंपने का काम किया गया. पेंगोलीन को मारवाड़ी में चींटीखोर भी कहते हैं.
यह एक ऐसा स्तनपाई जानवर है, जिसके मुंह में दांत नहीं होते. इसकी जीभ शरीर की लंबाई से लगभग दोगुनी होती है. यह चींटियों और दीमक को खाकर पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है. यह अपनी लंबी और पतली जीभ को चींटियों और दीमक के बिलों में 40 सेंटीमीटर तक अंदर डालकर उन्हें खाता है. दीमक को खाने से जमीन की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है.
पानी के टांके से किया गया सुरक्षित रेस्क्यू
सोजत शहर की एक कॉलोनी में जब स्थानीय लोगों ने पानी के टांके में इस विचित्र जीव को फंसा हुआ देखा, तो तुरंत स्नेक कैचर अजय कुमार को इसकी सूचना दी. अजय कुमार ने बिना समय गंवाए मौके पर पहुंचकर अपनी सूझबूझ और सतर्कता से इस बेजुबान को बिना कोई नुकसान पहुंचाए टांके से बाहर निकाला. रेस्क्यू के बाद इस दुर्लभ जीव को वन विभाग की टीम के सुपुर्द कर दिया गया, ताकि इसे वापस इसके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ा जा सके.
कौन है ‘मारवाड़ का चींटीखोर’ और क्या है इसकी खूबियां?
पैंगोलिन एक बेहद खास और विचित्र स्तनपायी जीव है. इसकी लंबाई करीब 2 फीट और वजन लगभग 8 से 10 किलो तक होता है. इसका पूरा शरीर सख्त शल्कों से ढका रहता है, जो इसे बाकी जीवों से अलग पहचान देते हैं. पैंगोलिन की सबसे खास बात यह है कि इसके मुंह में दांत नहीं होते. भोजन के लिए प्रकृति ने इसे लंबी और चिपचिपी जीभ दी है. इसकी जीभ करीब 40 सेंटीमीटर लंबी होती है, जो इसके शरीर की लंबाई से लगभग दोगुनी है. पैंगोलिन अपनी पतली जीभ को चींटियों और दीमक के गहरे बिलों में करीब 40 सेंटीमीटर तक अंदर पहुंचाता है और वहां मौजूद कीड़ों को अपना भोजन बनाता है. यही अनोखी जीभ इसकी सबसे बड़ी खासियत है.
पर्यावरण संतुलन के हैं मूक रक्षक
पैंगोलिन केवल एक दुर्लभ जीव ही नहीं है, बल्कि पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में भी इसका बहुत बड़ा योगदान है. भारी मात्रा में दीमक और चींटियों को खाने से यह न सिर्फ फसलों और पेड़ों को नुकसान से बचाता है, बल्कि इससे जमीन की उपजाऊ क्षमता भी बढ़ती है. दीमक के खात्मे से मिट्टी में प्राकृतिक वातन होता है, जिससे यह जीव ‘इकोसिस्टम के साइलेंट वर्कर’ की भूमिका निभाता है.
दो साल पूर्व जवाई क्षेत्र में दिखा था यह दुर्लभ जीव
भारत में पैंगोलिन अब एक अति दुर्लभ वन्यजीव प्रजाति बन चुका है और पूरे देश में इनकी संख्या महज 6000 के करीब ही बची है. ऐसे में मारवाड़ क्षेत्र, विशेषकर पाली जिले में इसका मिलना वन्यजीव प्रेमियों और वन विभाग के लिए बड़ी हैरानी की बात है. हालांकि, करीब दो साल पहले पाली के ही जवाई क्षेत्र में भी एक पैंगोलिन देखा गया था. सोजत में पानी के टांके से इसका सुरक्षित निकाला जाना एक बड़ी कामयाबी है, जो वन्यजीव संरक्षण की दिशा में सुखद संदेश है. पेंगोलीन को मारवाड़ी में चींटीखोर भी कहते हैं. यह एक ऐसा स्तनपाई जानवर है, जिसके मुंह में दांत नहीं होते. इसकी जीभ शरीर की लंबाई से लगभग दोगुनी होती है. यह चींटियों और दीमक को खाकर पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है.



