40 दिनों तक हरी सब्जियां नहीं खाते गवरी कलाकार, घर से दूर रहकर निभाते हैं ये कठिन नियम, जानें अनोखी परंपरा

Last Updated:October 01, 2026, 12:56 IST
Udaipur Hindi News: गवरी में कलाकार अलग-अलग किरदार निभाते हैं.लोककथाओं, देवी-देवताओं और समाज से जुड़े प्रसंगों को नृत्य, संवाद और अभिनय के जरिए लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाता है.खास बात यह है कि गवरी के दौरान कलाकार और दर्शकों के बीच भी एक अलग तरह का जुड़ाव देखने को मिलता है. गांव में गवरी पहुंचना आज भी सामूहिक उत्सव जैसा माना जाता है.
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उदयपुर: मेवाड़ की लोक संस्कृति में गवरी सिर्फ एक लोकनाट्य नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और अनुशासन से जुड़ी हुई एक अनोखी परंपरा है. भील समाज की ओर से निभाई जाने वाली गवरी करीब 40 दिनों तक चलती है. इस दौरान गवरी खेलने वाले कलाकार कई तरह के कठिन नियमों का पालन करते हैं. यही नियम इस परंपरा को बाकी लोककलाओं से अलग बनाते हैं. कलाकार इन दिनों में अपने घर नहीं लौटते और गांव-गांव जाकर गवरी का मंचन करते हैं.
इतिहासविद् श्रीकृष्ण जुगनू बताते हैं कि गवरी की परंपरा मेवाड़ के भील समाज में सदियों से चली आ रही है. इसे केवल मनोरंजन के तौर पर नहीं देखा जाता, बल्कि इसके पीछे धार्मिक आस्था और सामूहिक जीवन की भावना भी जुड़ी हुई है.गवरी शुरू होने के बाद कलाकार करीब 40 दिनों तक अपने घर-परिवार से दूर रहते हैं और तय नियमों के अनुसार ही अपना जीवन बिताते हैं.
खास नियमों में से एक हरी सब्जियों का सेवन नहीं करना गवरी के दौरान सबसे खास नियमों में से एक हरी सब्जियों का सेवन नहीं करना है. कलाकार इन दिनों हरी सब्जियों से दूरी बनाकर रखते हैं. इसके पीछे परंपरा और धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. इसी तरह गवरी खेलने वाले कलाकारों के लिए घर वापस जाना भी वर्जित माना जाता है. वे अपने दल के साथ ही रहते हैं और जिस गांव में गवरी का आयोजन होता है, वहीं रुककर भोजन और दूसरी जरूरी व्यवस्थाएं करते हैं.
कलाकारों का रहन-सहन भी काफी अलग होताइस दौरान कलाकारों का रहन-सहन भी काफी अलग होता है. कई कलाकार नंगे पैर ही गवरी के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं. यानी 40 दिनों तक बिना चप्पल-जूते के रहने की परंपरा भी निभाई जाती है. गर्मी हो या बारिश, कलाकार इसी नियम के साथ अलग-अलग गांवों तक पहुंचते हैं और गवरी का मंचन करते हैं.
गवरी पहुंचना आज भी सामूहिक उत्सव जैसा माना जातागवरी में कलाकार अलग-अलग किरदार निभाते हैं. लोककथाओं, देवी-देवताओं और समाज से जुड़े प्रसंगों को नृत्य, संवाद और अभिनय के जरिए लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाता है. खास बात यह है कि गवरी के दौरान कलाकार और दर्शकों के बीच भी एक अलग तरह का जुड़ाव देखने को मिलता है. गांव में गवरी पहुंचना आज भी सामूहिक उत्सव जैसा माना जाता है.
मेवाड़ की लोक संस्कृति और भील समाज की परंपराओं की पहचानइतिहासविद् श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार, गवरी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसमें कला के साथ अनुशासन और आस्था भी जुड़ी हुई है. कलाकार करीब 40 दिनों तक अपने व्यक्तिगत जीवन से दूरी बनाकर इस परंपरा को निभाते हैं. यही वजह है कि आधुनिक समय में भी गवरी मेवाड़ की लोक संस्कृति और भील समाज की परंपराओं की पहचान बनी हुई है.
About the AuthorJagriti Dubey
मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…
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Udaipur,Rajasthan
First Published :
October 01, 2026, 12:56 IST



